निर्दोष लोगो के हत्या की जवाबदेही तय हो…!

चुनाव हारने के एवज में  पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश  बना दिया गया, वहां 4 मई के बाद से जो हिंसा शुरू हुई वह भाजपा के बड़े नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सचिव चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद भी आगे बढ़ती नजर आ रही इसके लिए अब न्यायपालिका की जवाबदेही तय होनी चाहिए। न्यायलयी प्रक्रिया में न्याय के लिए एक निश्चित समय की मांग पहले से उठती रही है। मुकदमे अनगिनत तारीखों पर वकीलों के कमाने का जरिया बनते जा रहे। जनता न्यायतंत्र से उबने लगी है और हत्याएं इसलिए भी बढ़ रही की मुजरिमो को लगता है कि फैसला जल्दी  आएगा नहीं और मुकदमा लड़ते लड़ते सामने वाला खुद पस्त हो जायेगा। इसके बावजूद कोर्ट में लाखों सामान्य मुकदमे वर्षों से चल रहे। बंगाल में 2.4 लाख अर्धसैनिक बलों की तैनाती है, तमाम बंदरबख्त गाड़ियां और 100 से अधिक इनकाउंटर स्पेशलिस्ट पर्यवेक्षक के रूप में मौजूद रहे है।
एक बार्डर स्टेट को चुनाव के चक्कर में टीएमसी आप कांग्रेस इत्यादि द्वारा अशांत प्रदेश बना दिया गया है, बार्डर स्टेट चाहें पंजाब, अरुणाचल प्रदेश हो पश्चिम बंगाल कोई भी यदि अस्थिर रहे तो यह देश के लिए उचित नहीं होगा और पड़ोसी ताकते हावी हो जाएंगी। इसके बावजूद कि भारत के पड़ोसियों से संबंध कटुता की सीमा पार कर चुके हैं अपनी पार्टी को जिताने की सनक में उसे अस्थिर कर देना देश विरोधी काम है। धर्म के आधार पर चुनाव जीतने का आरोप झेल चुकी भाजपा का हाल यह है कि मंदिरों की भूमि तमिलनाडु में भाजपा को सफलता ही नहीं मिल पा रही अर्थात चुनाव अब केवल बाहुबल का खेल है। तमिलनाडु में 38,000 से अधिक मंदिरों और 90% हिंदू आबादी है। इतने प्रचंड मंदिरो वाले तमिलनाडु में भाजपा का दबदबा कायम नहीं है। 46 वर्षों के बाद भी, पार्टी हालिया चुनावों में एक भी सीट हासिल करने में विफल रही, जिससे यह साबित होता है कि दक्षिण की राजनीति का स्वरूप बिल्कुल अलग है।
इसका कारण लेफ्ट का प्रभाव और द्रविड़ पहचान की गहरी जड़ें हैं। तमिलनाडु में आस्था और राजनीति अलग-अलग क्षेत्रों में हैं; हालांकि लोग अत्यधिक धार्मिक हैं, उनकी राजनीतिक निष्ठा सामाजिक न्याय, भाषाई गौरव और आत्मसम्मान आंदोलन की विरासत से जुड़ी है। शोध से पता चलता है कि यहां के मतदाता केंद्रीकृत राष्ट्रवादी विचारधारा की तुलना में क्षेत्रीय स्वायत्तता और “तमिल पहचान” को प्राथमिकता देते हैं, जो भारत के अन्य हिस्सों में लोगों का दिल जीत लेती है।
यह एक दिलचस्प उदाहरण है कि कैसे सांस्कृतिक गौरव धार्मिक जनसांख्यिकी पर भारी पड़ सकता है। क्या इसका मतलब यह है कि द्रविड़ बहुल क्षेत्र में “कमल” कभी नहीं खिलेगा, या भविष्य में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव होने वाला है। बंगाल में, वहां की जनता को वोट के लिए भड़काया गया है, उग्रता फैलाई गई है, गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं टीएमसी के गुंडे है, उल्टा लटकाकर सीधा कर देंगे। इस पर जहांगीर और सयोनि भड़काऊ स्पेशलिस्ट तो वहां लगातार भड़काऊ बयान देते रहे और ऊपर से ममता के खुद लगातार भड़काऊ बयान आते रहे है।
देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोग सिर्फ चुनाव जीतने के लिए देश में गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं।‌ जिन लोगों पर देश में शांति व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदारी है वह देश के एक प्रदेश को सिर्फ पोलराइजेशन और चुनाव के लिए अशांत कर रहें हैं, वहां के लोगों को भड़का रहें हैं। वहां की जनता चुनाव परिणाम के बाद नहीं भड़की है बल्कि गुंडे भड़क गए है। आराजकता भड़क गई, मारकाट कर रही है , सैकड़ों वीडियो वायरल हैं, और सुभेंदु अधिकारी को भी इसका दंश‌ झेलना पड़ा, उनका सबसे प्रिय निजी सचिव चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस सबके बावजूद कोई कुछ नहीं कह रहा है, मीडिया इस पर चुप है, और न्यायालय से तो अब कोई उम्मीद ही बेकार है, अपना समय और पैसे खराब करना मतलब न्यायालय जाओ। किसी सरकार का बहुमत अब सदन में नहीं राज्यपाल के आदेश से तय होगा, तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर, थलपति विजय से कह रहे हैं कि 113 नहीं 118 विधायकों के समर्थन की सूची दो तब सरकार बनाने का न्योता मिलेगा बात सही है।
जबकि इसी देश में परंपरा रही है सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने की जिस पर ममता का स्तिफे से इंकार के बाद लोग संविधान के निष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे। अटल बिहारी वाजपेई की 13 दिन, 13 महीने की सरकार भी ऐसे ही बनी थी मगर तब लोकलाज था अब थेथरई और गुंडागर्दी। सरकार बनाता देख थलपति विजय के पक्ष में  कांग्रेस नें रास्ता खोल दिया गया है जल्दी ही विजय भी भाजपा के चपेट में दिखाई देंगे और चुनाव पहले भी आते जाती रहें हैं, मगर अब जैसे युद्ध लड़ा जा रहा है, सत्ता दल के नेताओं और विपक्षी दल के नेताओं के बीच संवाद खत्म हो गया है, नरेंद्र मोदी का राहुल गांधी को नमस्ते करना हेडलाइन की सुर्खियां बन गयी हैं। हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों को एक एक करके छीना जा रहा है, बात बात पर मार डाला जा रहा है, यह सब चुनाव जीतने के लिए हर जगह एक बड़ा खलनायक बना कर उसपर आक्रमण करने का परिणाम है।
पश्चिम बंगाल में जिस अजय पाल शर्मा को खलनायक बनाया गया, हैरानी की बात है कि उसका कोई ख़राब बैकग्राउंड है ही नहीं ना उन पर एक भी अराजक आरोप .. अपने लोगों को एक नाम और समाज से डरा कर चुनाव जीता जा रहा था, जनहित के मुद्दे, नौकरी, मंहगाई और जीवन में खुशहाली के मुद्दे पर चुनाव लड़ना इतिहास की बात हो गई है। हज़ारो साल के इतिहास वाले भारत मे “स्वतंत्रता” के मात्र 79 साल में हम यहां तक पहुंच गये हैं, 1947 का ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल सच हो रहा है जिसने तब कहा था कि  ब्रिटिश शासन हटने के बाद भारत में अराजकता, भ्रष्टाचार और टूट-फूट बढ़ेगी और लोकतांत्रिक व्यवस्था टिक नहीं पाएगी। उस वक्त के एक बड़े ब्रिटिश लेखक रुडयार्ड किप्लिंग ने भारत को स्वतंत्र करने के विरोध में कहा था कि भारतीय चार हजार साल पुराने समाज के लोग हैं और स्वशासन के योग्य नहीं हैं। भारत में स्वतंत्रता अधिक दिन नहीं रहेगी” कांग्रेस समर्थक गलतफहमी में हैं। वह बीजेपी के उभार के लिए अन्ना हज़ारे जैसे आंदोलन को पानी पी पी कर गाली देते हैं (हालांकि उसके ही आस पास निर्भय रेप कांड पर चुप्पी साध लेते हैं) शायद उनके लिए वह भी फर्जी था !!
विपक्ष पन्द्रह सालों में अभी भी मोदी सरकार के खिलाफ एक भी घोटाला (अगर हुआ है) तो उजागर नहीं कर पाया। वह सिर्फ ट्रंप की बेतुका टिप्पणी पर लो लो को को कर रहा है। सत्ता पक्ष के खिलाफ कोई पुख्ता आधार न होकर उसका हो हल्ला आम जनता को खिसियानी बिल्ली से अधिक नहीं लग रहा है। जनता अंधी नहीं है, मोदी के आगे पीछे कोई नहीं है। आज मोदी है कल बीजेपी में कोई और आ कर सिंहासन सम्भाल लेगा। अब बात होती है कि यूपीए क्यों सत्ता से बाहर हो गई ? उस समय कांग्रेस ने स्वयं घोटालों की लड़ी लगा कर  बीजेपी के हाथ में सत्ता दे दी। निरंकुश शासन था। गांधी परिवार का अपने नेताओं पर कोई कंट्रोल नहीं था (या सब उनके आंखों के नीचे हो रहा था ) २g घोटाला, कोलगेट घोटाला, कामनवेल्थ खेल, आदर्श घोटाला, सत्यम घोटाला एवं इत्यादि अनेकों घोटालों को लेकर “1.86 लाख  करोड़ का अनुमानित घोटाला”। जब आप घोटाला उजागर करते हो तब जनता की छाती पर आग लोटती है। उसको लगता है कि इन गुंडे और भ्रष्टाचारी नेताओं की वजह से ही उनका खर्चा बढ़ता जा रहा है। आम जनता  गरीब हो रही है।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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