योग्यता रोती, जातिवादिता हँसती….. आरक्षण की बेड़ी में, प्रतिभाएं  फँसती…..

हर जाति  का एक चरित्र होता है जिसके कारण उसे पहचान मिलती है, वह हज़ारों साल से उसी पहचान के आधार पर सफ़ल होता रहा  है , दुनिया उसे उसके उसी मूल चरित्र और मूल पहचान के कारण जानती है , सम्मान देती है। फिर चाहे महर्षि दधीचि, महर्षि विश्वामित्र, राजा हरिश्चंद्र, आदि शंकराचार्य, रामानुज, मध्वाचार्य, रामानंद, तुलसीदास,मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु, सावित्री, सीता , द्रौपदी , अनसूया , गार्गी , मैत्रेयी, अरुंधती, या वर्तमान ब्राह्मण समुदाय हो इनका अपना पुरातन धर्म के प्रति सम्मान ही आज सभी जाति को अपने मूल में सम्हाले है
। दरअसल अपने चरित्र के कारण ही हज़ारों साल से सफ़ल और विश्व का सबसे सहिष्णु जाति कहे जाने वाला जाति ब्राह्मण 1987 से राजनीतिक हथकंडो के कुचक्र में फंस कर अपना मूल चरित्र बदल रही है। यह किसी भी जाति के लिए घातक है कि उसका मूल चरित्र और आधार ही बदल दिया जाए जिसके कारण उसकी विश्व भर में सम्मानजनक पहचान बनी हुई थी। वही इश्लाम में लोग अब शक के नजर से देखे जाते है। शाहरुख खान तो स्विकार कर चुके हैं कि उन्हें सिक्योरिटी चेक में नंगा किया गया वहीं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे कलाम को दो दो बार अमेरिका में अपमानित होना पड़ा। अप्रैल 2009 में अमेरिका की एक एयरलाइन ने डॉ. कलाम की अनुचित सुरक्षा जांच की। वहीं 29 सितंबर 2011 को जब डॉ. कलाम न्यूयॉर्क के एक एयर इंडिया की उड़ान द्वारा भारत लौट रहे थे तब सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें पहले सामान्य सुरक्षा जांच से गुजरने दिया, लेकिन विमान में बैठने के बाद फिर से विमान का दरवाज़ा खुलवाकर उनके जूते और जैकेट दोबारा जांच के लिए ले लिए। यह सब उसी प्रोपगंडा का असर था, सोचिए यह सब शाहरुख खान और ए पी जे डाक्टर अब्दुल कलाम के साथ हुआ तो आम मुसलमानों के साथ क्या हुआ होगा ?
बहुत अपमानजक और तकलीफ देह होता है जब बेगुनाह गरीब ब्राह्मण का हक़ मारकर उसे किसी आरक्षित जाति के अमीर को दिया जा रहा। ऐसे ही जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा , युरोप और पूरी दुनिया में गैर सवर्ण जाति को शक की निगाह से देखा गया, और नाम तथा चेहरा देखते ही सुरक्षा एजेंसियां एलर्ट हो गयीं। लादेन और बगदादी के मारे जाने के दशकों बाद मुसलमान और इस्लाम उस दौर से निकल गये , तो इसका कारण था कि बड़े बड़े मुस्लिम ओलेमा और इस्लामिक संस्थानों ने लादेन और बगदादी के आतंकवाद से ना खुद को अलग कर लिया बल्कि इनके और आतंकवाद के खिलाफ फ़तवा दिया।यही नहीं सऊदी अरब में मक्का की मस्जिद “अल-हरम” और मदीना की “मस्जिद-ए-नबवी” के संरक्षक सऊदी अरब की सर्वोच्च धार्मिक संस्था “काउंसिल ऑफ सीनियर रिलिजियस स्कॉलर्स” ने 17 सितंबर 2014 को आतंकवाद के खिलाफ एक महत्वपूर्ण फतवा जारी किया और इसकी निंदा की। हिंदुत्व के फ्रंट लाईम में आने के बाद भारत में दारुल उलूम देवबंद से आतंकवाद के खिलाफ औपचारिक फतवा 31 मई 2008 को जारी किया गया। कौन नहीं जानता कि लादेन और बगदादी अमेरिकी पिठ्ठू थे ?… उनके लिए काम कर रहे थे। ठीक इसी प्रकार विदेश के फण्ड से अभिजीत दिमके के एक काल पर हज़ारों उपद्रवियों का जमावड़ा जितना आश्चर्य जनक रहा उससे कहीं ज़्यादा उसने वर्तमान सरकार के अच्छे दिनों पर विराम लगना है। यूं तो इसकी शुरुआत नीट के पेपर लीक और उससे प्रभावित बीस छात्र छात्राओं की मौत जैसे मुद्दों से हुई थी।यूवाओं में अब तक जो घोर निराशा व्याप्त थी उसे इसमें आशा की किरण दिखाई दी और वे बेखौफ इससे जुड़ते चले गए।उनकी ये मांगे थी जिनमें केन्द्रीय शिक्षा मंत्री मोहन प्रधान का इस्तीफा।मृत छात्रों के परिवार को एक करोड़ की आर्थिक मदद एवं शिक्षा नीति की समुचित व्याख्या और आरक्षण पर पुनर्विचार।
इन मांगों को देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवा छात्र नेताओं और उनके साथियों का भरपूर समर्थन मिला। मशहूर पर्यावरण विद , जाने-माने फण्ड मैंन वांगचुक ने इन मांगों के लिए भूख हड़ताल शुरू की उनके साथ लेफ्ट वाली आईसा की अध्यक्ष नेहा बोरा और एक दर्जन मनबढ़  छात्राएं भी अनशन में शामिल हो गईं। जो लगभग 24दिन चली।इस बीच खराब मानसिकता के कारण झारखण्ड छात्र प्रदर्शन के मंच से नेहा बोरा को बेइज्जत करके उतारा गया। उस पर एक देशभक्त युवक ने स्याही फेंक उसे यह बता दिया कि जंतर मंतर का धोखा देश में नहींचलेगा।  दृश्य ने देश भर के दूरदराज़ युवाओं को झारखण्ड सरकार के विरुद्ध आंदोलन में शामिल होने बाध्य किया वह आश्चर्य जनक था। इधर आक्रोशित युवाओं ने पूरी ताकत से आंदोलन को गति दी है और झारखंण्ड में असली छात्र आंदोलन का आईना दिखा कर दीपके और सौरव दास को एक्सपोज़ कर दिया। माहौल अब कॉकरोच के खिलाफ बन गया। ऐसे क्षणों में अमित शाह की दिल्ली पुलिस ने उपद्रवीयों के  साथ जिस तरह सख़्ती बरती वह सत्य के साथ आग्रह करते छात्रों के लिए परेशान करने वाली नहीं थी। इससे प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी और समूचे विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिला।
कांग्रेस पार्टी ने पीएम आवास पर धरना दिया।उन सबको भी पुलिस ने बेरहमी पूर्वक गिरफ्तार कर दूर क्षेत्रों में छोड़ा। लेकिन इसके बाद युवाओं ने प्रतिरोध को गृहमंत्री और प्रधानमंत्री पर केंद्रित कर दिया।उधर संसद में दोनों नदारद रहे, इधर प्रदर्शनकारियों के ज़ुल्म बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि इस आंदोलन में संस्थापक अभिजीत दिमके अपनी झूठी बीमारी के कारण अनुपस्थित रहे किंतु जो आग युवाओं में प्रज्वलित हुई है वह बुझने वाली नहीं है।उधर प्रतिपक्ष नेता के सवाल सदन में गूंज रहे हैं तो संसद के बाहर अमितशाह और मोदीजी के खिलाफ आंदोलन बदस्तूर जारी है।इस आंदोलन में छात्राओं ने अपनी जबरदस्त उपस्थिति और हौसलों के नए कीर्तिमान स्थापित किए।उनकी निडरता ऐतिहासिक थी। सबसे अच्छी बात आंदोलन की यह रही कि यह आंदोलन जेन जेड से जेन अल्फा तक पहुंच चुका है। जिसके जरिए वे अपने स्कूल कालेज में भी आरक्षण विसंगतियों पर प्रतिरोध करना शुरू किए हैं।कई जगह उनकी मांगे भी आ रही  हैं।कुछ जगह आश्वासन मिले हैं। लेकिन इन छुटपुट आंदोलनों ने भी देश में जागरण की एक नई इबारत लिखना शुरू की है। यह शुभ संकेत है।  इस तरह सवर्ण यदि प्रतिरोध की रणनीति पर काम करता है तो उम्मीद की जा सकती है कि शिक्षा के प्रारंभिक चरण में आरक्षण जैसी जो बिगड़ैल स्थितियां उफान पर हैं उन पर रोक लगेगी। जैसा कि काक्रोच पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिमके ने पांच अगस्त कोअपनी संभाजीनगर बैठक समाप्त करने के बाद बताया है कि वे शिक्षा, निष्पक्ष चुनाव और  गरीबों को न्याय दिलाने की मुहिम हेतु देश भर में कमेटियां बनाएंगे उसमें इन जेन अल्फा को भी शामिल करें ताकि शिक्षा संबंधी विसंगतियों की जानकारी उन्हें मिलती रहे।
गांवों के जेनजेड को भी प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे छोटी छोटी समस्याओं को मुख्यालय स्तर पर ही सुलझा सकें। आंदोलन ज़रुरत पड़ने पर ही हों।उनके पालकों को भी साथ देने की ज़रुरत होगी। बहुसंख्यक शिक्षक,निरीक्षक और अधिकारी इस अभी तक सोए हुए हैं। उन्हें भी जगाना ज़रुरी है यह सब केवल मक्कारी है। राजनीति में आने के लिए रास्ता बनाया जा रहा। आशा थी कि  काक्रोच एक सितम्बर से अपने इस अभियान में सक्रियता से काम करेंगे। मास्टर प्लान अच्छा है।  सामाजिक चेतना से ही निश्चित तौर पर देश को नई दिशा मिलती पर यहां मानसिकता ही गन्दी है ।जो राजनीति से फिलहाल संभव नहीं। महिलाओं को भी बराबर साथ लाना होगा।एक बार पुन: थैंक्स सफल उग्रवाद के लिए दीपके साहब । अब उस राजनीति पर पूरा नियंत्रण राजनीतिक  शंकराचार्य लोगों के हाथ में नहीं बल्कि सवर्णो और ब्राह्मणों के हाथ में है , अठावले जैसे विकृत नेता  अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए आरक्षण के पक्ष के लिए  नयी नयी मान्यता नये नये कहानी  गढ़ रहे हैं… जहां से उन्हें आर्थिक और राजनीतिक लाभ हो… आरक्षण के मूल चरित्र को नष्ट करके समानता का नियम बनाया  जाय। दंगाईयों और हुड़दंगियों पर विपक्ष  द्वारा फूल बरसाए जा रहें हैं, जिससे सत्ता के संरक्षण में वह और मनबढ़ बनें, और उग्र हों ,छात्र  जुलूस में उपद्रव जगह जगह हो, संसद के  सामने डीजे बजे।
पंकज सीबी मिश्रा राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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