पहले मॉक संसद फिर रामलीला मैदान में धरना और उससे भी बात नहीं बनी तो पीएम मोदी को सड़क डिबेट के लिए ललकार दिया। आखिर राजनीतिक दायरे से बाहर निकल कर राहुल एंड कंपनी कैसे लड़ पाएगी। जनता जुमलेबाजी और पप्पुगिरी दोनो से अजीज है। नए विकल्प की दूर दूर तक कोई गुंजाइस नहीं ऐसे में भाजपा फिर वापसी करेगी यह कहना जायज है। एक कहानी याद आती है कि किस्मत की बात थी बिल्ली को जंगल की बादशाहत मिल गई। सबसे पहले उसने कुत्तों पर पाबंदियां लगाई और चूहों को राष्ट्र का मित्र बताया। कुत्तों की जान पर बन आई। न खुले में घूम सकते थे न पेड़ों के तनों पर मूत सकते थे। आधी रात को भौंकने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। उन्हें खाने के लाले पड़ने लगे, जीना मुहाल हो गया। इधर चूहों की किस्मत जाग उठी। चूहे जंगल मित्र बनाए गए तो उनकी शान बढ़ गई। जहां यहां घूमते रहते, जो मन किया कुतर लेते, जहां मन किया बिल बना दिया। सोए हुए जानवरों के कान कुतर लेते तो कभी किसी पंछी का घोंसला तोड़ देते। वैसे भी चूहों को बिल्लियों के अलावा किसी और जानवर से ख़तरा कम ही था, दूसरे कुत्ते थे जो मौका मिलते ही उन्हें दबोच लेते पर अब इनपर बंदिशे थी। मौज ही मौज थी चूहों की।
नए नियमों की सुनकर आसपास के जंगलों के दूसरे चूहे भी आकर बसने लगे। कई कालोनियां बस गई चूहों की। बिल्लियों की तो निकल पड़ी थी। आधी रात में कभी इस बिल तो कभी उस बिल के चूहों का शिकार कर लेती। चूहे एक नहीं थे तो किसी को फर्क नहीं पड़ता था कि कब कौन शिकार बन गया। जंगल का कानून पूरी तरह बदल गया था। जंगली कुत्ते जो शिकार कर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहयोग करते थे असहाय थे। जंगल में जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने लगा था। गर्मियां आई तो पानी की कमी होने लगी, पेड़ सूखने लगे और घांस सूखने लगी। चूहों को सारे वक्त कुतरने की आदत होती है, उन्हें जब खाने की कमी होने लगी तो वो झुंड बनाकर छोटे जानवर जिसे खरगोश, गिलहरी को अपना शिकार बनाने लगे। पेड़ों की जड़ें कुतरने लगे। सूखते हुए पेड़ भड़भड़ा कर गिरने लगे। बिल्लियों ने अपने लालच में चूहों को फंसाए रखने के लिए जाल डाला था वो अब उनके लिए ही मुसीबत बन गया। पर उन्हें भर पेट भोजन मिल जाता था इससे वो संतुष्ट थी। बाकी सब जाएं भाड़ में।
सारे जानवर त्रस्त हो गए थे। एक दिन सब मैदान में इकट्ठा हुए। कांव कांव हुआ हुआ और भौं भौं जैसी आवाजों से जंगल गूंज उठा। बिल्ली अपने सिंहासन पर बैठी थी उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे सबको शांत किया जाए। बिल्ली शेर की मौसी भले होती है पर राजा वाले कोई गुण उसमें नहीं होते। कमज़ोर हो चले कुत्तों की मांग थी कि इनपर से प्रतिबंध हटाया जाए तो खरगोश चाहते थे कि चूहों को उनके बिलों पर कब्जा करने से रोका जाए। गिलहरियों की गुहार थी कि उनके इकट्ठा किए खाने को चूहों के हमलों से बचाया जाए। बिल्ली को समझ नहीं आ रहा था कि सबको संतुष्ट कैसे किया जाए। राजा अपने हित में जब निर्णय लेने लगे तो प्रजा विद्रोह पर उतर आती है ये उसे नहीं पता था। काफ़ी देर तक जब बकबक झकझक होती रही और कोई निर्णय नहीं होता दिखा तो कुत्तों के एक झुण्ड ने बिल्ली पर हमला किया और उसकी जान ले ली। उसकी लाश कुत्तों के झुण्ड के बीच फेंक दी गई। सारे कुत्ते मिनटों में उसे चीर फाड़ कर खा गए। सभा में सन्नाटा छा गया। कुत्तों का झुंड अब सिंहासन पर बैठा था। सारा जंगल उनके भौंकने से गुंजायमान होने लगा था। एक युवा मज़बूत हट्टेकट्टे कुत्ते को ताज पहनाया गया। अब लोमड़ी को मित्र घोषित किया गया, बिल्लियों को जंगल छोड़ने की चेतावनी दे दी गई। फ़िर राज बदल गया। दोस्त दुश्मन की परिभाषा बदल गई बस नहीं बदली तो आम जानवरों की तकदीर। अखिलेश यादव उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जिसकी नींव नीतीश और लालू जैसे धुरंधर राजनेता ने बिहार में रखी थी । यही राजनीतिक कौशल भी है। चुनाव न लड़ने को घोषणा करके अखिलेश ने वही किया है। अच्छा सामने वाले को चौका भी रहे हैं। लगता है यह कौशल मोदी जी से सीखा है। वैसे एक चतुर राजनेता का यही गुण होता है।
वह सबकी अच्छी बातों को अपना लेता है। उसी रास्ते पर अखिलेश चल रहे है। फिर सवाल होगा कि चुनाव न लड़ने की बात करके, वे ठीक संदेश नहीं दे रहे हैं । सही बात तो यह है कि सपा प्रमुख भाजपा को खेलने का मौका नहीं दे रहे हैं। उन्हें करहल याद है। और यह भी कि किस तरह की घेराबंदी होती है। इसे वे अफोर्ड नहीं कर सकते हैं। इसलिए अखिलेश इस बार बीजेपी की घेराबंदी में लगे हैं। दांव सब वही हैं जो बीजेपी चलती है। बस जगह बदल गई है। पार्टी बदल गई है अखिलेश यादव बदल गए हैं। इस बार बीजेपी जिससे मुक़ाबिल है वे 2017 और 2022 वाले अखिलेश नहीं है। ये अखिलेश भी जेन जी वाले है। बारीक नजर है इनकी। सियासत के हर धागे को करीने से सुलझाने में लगे है। उसके लिए जरूरी है खुद उलझन से दूर रहे हैं। चुनाव लड़ते तो भाजपा को उलझा देती। यह सपा प्रमुख जानते हैं। पिछली बार भी सारा विमर्श करहल के इर्द गिर्द ही बना गया था। माहौल भी वही से बना था। उसका असर हुआ था। सो अखिलेश सधे हुए राजनेता की तरह खेल रहे हैं। मौका नहीं देना चाहते। उधर कांग्रेस अपने ही गठबंधन साथी आप की पंजाब में मिट्टी पलिद करने पर आमादा है जिसका फायदा फिर भाजपा को मिलना तय है।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक जौनपुर यूपी
