दो दिन पूर्व देश आज़ादी की 79वीं वर्षगांठ से जुड़ा पर क्या देश को जातिगत आरक्षण के भेदभाव और चुनावी आरक्षण से आजादी मिल पाया। सवर्ण राजनीति से देश को आज़ादी मिल जाएगी, पर क्या भीम राजनीति से आजादी मिल पाएगी ! यह सवाल बना हुआ है। सपा और कांग्रेस के लिए तो यही सुविधाजनक है कि लोग धर्म और जाति के झगड़ों में फंसे रहें ताकि शिक्षा, चिकित्सा, भोजन, पानी, रोजगार जैसे त्वरित विषयों पर सरकार को फर्जी तरीके से घेरा जा सके। आरक्षण खाने वाले युवाओं को काम ही नहीं करना पड़े। प्रधानमंत्री मोदी ने हर घर तिरंगा अभियान तो चलाया, इसके साथ ही संसद में वंदेमातरम का पूरा गान भी हुआ और आज लाचार विपक्ष पूरे मनोयोग से वन्दे मातरम गा रहा जबकि वन्दे मातरम संघ संस्थाओं का संघगीत माना जाता है।। ध्यान रहे कि अब तक वंदेमातरम के शुरुआती दो अंतरों को ही आधिकारिक तौर पर राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाता था। क्योंकि शुरुआती दोनों अंतरों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और समृद्धि का वर्णन है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ही सुझाव था कि केवल शुरुआती पद लिए जाएं, क्योंकि इनमें धर्मनिरपेक्ष और सार्वभौमिक अभिव्यक्ति है। जबकि बचे हुए चार छंदों में हिंदू देवी-देवताओं (जैसे दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती) का स्पष्ट रूप से आह्वान और स्तुति की गई है।
79 बरस तक यही वंदेमातरम देश में गूंजता रहा और इस पर कोई राजनीति नहीं हुई। बेशक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कई बार पूरे गीत को गाने पर ज़ोर देता रहा और नरेन्द्र मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में संघ के इस एजेंडे को भी पूरा करके दिखा दिया। मैं इस बात को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दलित विक्टीम कार्ड खूब खेल रहें।। गौरतलब है कि आठ अगस्त को खड़गे ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक सभा को संबोधित किया था, इसके बाद हिंदूवादी संगठनों ने उस मंच का शुद्धिकरण किया, क्योंकि खड़गे उन नेताओं में से है जो हिन्दू राष्ट्र के खिलाफ है। इसलिए नहीं कि दलित मूल के हैं। खड़गे नौ बार विधायक और पांच बार के सांसद हैं। जब 2010 से पहले के कांग्रेस द्वारा पोषित घृणित जातिवादी और धर्मांध राजनीति दलित होने पर उनका अपमान कर सकती है, तो समझा जा सकता है कि देश में आज भी दलितों की कैसी दुर्दशा है। भाजपा के शासनकाल में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को सम्मान मिला है।
सवर्णों का अपमान हुआ है। यह सिलसिला लगातार चल रहा है। अखिलेश यादव मई 2024 में कन्नौज के बाबा गौरीशंकर महादेव मंदिर में दर्शन करने गए, तो उसके बाद स्थानीय यादवों ने ही उसका शुद्धिकरण किया था। राजस्थान में अप्रैल 2025 में अलवर में एक राम मंदिर में कांग्रेस नेता टीकाराम जूली के जाने के बाद दलित हिंदुओ ने गंगाजल छिड़क कर मंदिर का ‘शुद्धिकरण’ किया था। ऐसे दर्जनों मामले हैं, जहां इसी तरह गिरे नेता राजनीति करने पहुँचते है पर गैरसवर्ण हिन्दू उन्हें आईना दिखा देते है तो चिढ़कर इल्जाम भाजपा पर लगा दिया जाता है। अतिअवसर के चलते दलित नेताओं ने ही दलितों-पिछड़ों का अपमान किया है। दलितों के मूंछ रखने से लेकर विवाह में घोड़ी चढ़ने तक को लेकर आज सवर्णों पर झूठा इल्जाम लगाया जाता है। आज ऑफिस और तंत्र में दलित नेता अधिकारी और हुकमरानो द्वारा सवर्णों को शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है।
अल्पसंख्यकों – ख़ास तौर से मुसलमानों द्वारा दलितों पर अत्याचार की खबरें तो अब इतनी आम हो चुकी हैं कि जनसामान्य इन पर विचलित ही नहीं होता। यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि संसद के नए भवन के उद्घाटन का मौका हो या राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का केवल हिन्दू को भड़काया है विपक्ष ने। आदिवासी समुदाय से आने वाली राष्ट्रपति आज वहां मौजूद है जहाँ कांग्रेस इन्हे अछूत मानती थी,कांग्रेस इतनी गिरी क्यों ! ऐसा नहीं , इस सवाल का जवाब भाजपा बेहतर देगी बल्कि राहुल और अखिलेश का चाल, चरित्र और चेहरा दलित, आदिवासी, विरोधी है, यह बार-बार ज़ाहिर होता है। हालांकि विडंबना यह है कि विपक्ष से वंदेमातरम का पूरा गान संसद में करवाने के बावजूद राहुल और प्रियंका गाँधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के सामने सदन में रुकने की हिम्मत नहीं दिखा सके। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान केवल गाए नहीं जाते हैं, इनका असली मर्म तो तभी जाहिर होता है जब आपकी देशभक्ति कार्यों में परिणत हो। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का कार्य सदन में आकर विपक्ष के साथ चर्चा को आगे बढ़ाना होता है। मगर पूरे मानसून सत्र में मोदी और शाह सदन में इसलिए नहीं आए क्यूंकि राहुल गाँधी धरने की और तख्ती की राजनीति कर रहें।
इनकी वजह से सदन रोजाना ठप्प रहा, महज 15 घंटे काम हुआ। गुरुवार को सत्र के आखिरी दिन अपनी पूरी केबिनेट के साथ मोदी-शाह लोकसभा में आए भी तो वंदेमातरम सुनकर चले गए, महज तीन मिनट में ओम बिड़ला ने सूचना दे दी कि सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होता है। जबकि राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ने दलित होने की वजह से खूब हंगामा काटा। कितने सतही तरीके से जे पी नड्डा ने दलित उत्पीड़न के एक मामले पर प्रतिक्रिया दी है। जबकि बुधवार शाम से यह खबर सामने आ गई थी। भाजपा को भी इसकी खबर रही होगी, उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है, तो अपेक्षित था कि वहां खड़गे की राजनीति का स्वतः संज्ञान लेकर मामला उछाला जाता । मगर ऐसा नहीं हुआ, कांग्रेस को मामला भुनाने की मांग करनी पड़ी। सवर्णों ने हर बार अपमान के लिए दुख जताया, मगर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई अफ़सोस इस बात पर प्रकट नहीं किया कि सवर्ण आरक्षण हटाने के लिए क्यों जिद कर रहें। संसद में उनके वरिष्ठ, वयोवृद्ध साथी और प्रमुख विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष के मानसिकता पर सवाल उठना है ! उनके साथ ऐसा क्या हुआ है। मोदी शासनकाल में जितनी बार समाज के कमज़ोर तबकों का उत्पीड़न या अपमान हुआ है, मोदी ने कभी आगे बढ़कर इसके लिए ना सिर्फ अफ़सोस जताया बल्कि खुद की तरफ से माफ़ी भी मांगी।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर
