पिछले कुछ दिनों से चर्चाओ के बाजार में दो विषय बहुत ज़्यादा चर्चा में रहे, पहला कांग्रेस पार्टी द्वारा बुलायी गई एक नवंबर की रैली और दूसरा एमएलसी इलेक्शन पहले बात करते है एमएलसी इलेक्शन की। एमएलसी इलेक्शन में बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियो ने मिलकर कुल 16 सीट जीती है लेकिन जो महत्वपूर्ण है वो ये कि वाराणसी की दो सीट सपा और नागपुर की सीट कांग्रेस के पास गई है। कांग्रेस की कर्नाटक में सरकार होते हुए भी वो वहाँ एक भी सीट नहीं जीत सके ये एक अलग मुद्दा है जिस पर फिर कभी लिखूँगा। ये कांग्रेस के कुछ बड़े नेता और कार्यकर्ताओं का अहंकार है अभी इस पर लिखूँगा तो लेख लंबा हो जाएगा । ख़ैर अब इस विषय को लेकर मीडिया, सत्तापक्ष और ट्रोलर कम्युनिटी में एक जबरदस्त नरेटिव सेट करने की होड़ मची हुई है की ये चुनाव तो बैलेट पेपर से लड़ा गया फिर कांग्रेस क्यों हार गई ! असल में कांग्रेस लोकतंत्र के नाम पे एनार्की क्रिएट कर रहे है इन्हें सिर्फ अलोकतांत्रिक काम करना है। ये विदेशी टूलकिट है ये लोग देश द्रोही है वगेरह वगेरह का अलग नेरेटिव है। 28 सीटों के जो नतीजे आए हैं, उन पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरु हो चुकी है। दरअसल बुधवार को जब नतीजे आ ही रहे थे, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक पोस्ट आ गई, जिसमें कांग्रेस पर तंज कसते हुए उन्होंने लिखा- चुनाव बैलेट पेपर से हुए तो अंदाजा लगाइए कि कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं। और इसके साथ एक इमोजी भी डाला है।
इस पोस्ट के बाद सवाल उठने लगे कि किसी पार्टी की हार या जीत अपनी जगह है, लेकिन क्या प्रधानमंत्री मोदी पद की गरिमा भूलकर अब ट्रोलर्स की तरह बातें करने लगेंगे। मोदी की इस पोस्ट को ही आगे बढ़ाते हुए अमित शाह और देवेन्द्र फड़नवीस ने भी बिना देर किए अपनी तरफ़ से कांग्रेस के लिए शून्य सीटों का जिक्र कर मज़े लिए। लेकिन अब उनका यह फूहड़ता से मजा लेना, भाजपा पर ही भारी पड़ चुका है। तो मेरे प्रिय वोटरों तुम्हे मैं पहले संक्षेप में एमएलसी और एमएलए इलेक्शन की प्रक्रिया और इसका फ़र्क़ समझाता हूँ। एमएलसी चुनाव में मतदाता उम्मीदवारों के सामने 1, 2, 3… लिखकर अपनी पसंद बताते हैं 1 पहली, 2 दूसरी और 3 तीसरी पसंद। पहले पहली पसंद के वोट गिने जाते हैं। यदि कोई उम्मीदवार जीत का तय कोटा नहीं पाता, तो सबसे कम वोट वाले उम्मीदवार को बाहर कर दिया जाता है। उसके मतपत्रों पर अगली पसंद देखी जाती है और वोट उस पसंद के ऐसे उम्मीदवार को मिलता है जो अब भी मुकाबले में हो। यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक कोई उम्मीदवार जीत का कोटा हासिल न कर ले। इसलिए अंतिम नतीजा सिर्फ पहली पसंद के वोटों से तय नहीं होता।अगर किसी को इसे डिटेल में समझना हो तो चुनाव विभाग को लिख दे वो समझा देंगे। देश के चार राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए चुनाव हुए। जिस के नतीजों से इस समय सियासी हलचल तेज हो गई है।
हालांकि विधान परिषद के चुनाव विधानसभा चुनावों से अलग होते हैं। इसमें जनता सीधे मतदान नहीं करती, बल्कि उसके द्वारा चुने प्रतिनिधि मतदान करते हैं। विधान परिषद के सदस्य यानी एमएलसी छह सालों के लिए निर्वाचित होते हैं और सबसे बड़ी बात ये चुनाव मतपत्रों से होते हैं। मतलब चुनावी राजनीति का विधान परिषद चुनाव से सीधे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन जब पंचायत से लेकर स्थानीय निकाय तक के चुनावों में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीधी दिलचस्पी रहती है, तो फिर एमएलसी चुनाव भी आम चुनावों जैसी हलचल मचा देते हैं। भाजपा के लिए एक बड़ा झटका नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से भी आया है। यहां के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र दोनों में सपा की जीत हुई है। लखनऊ भी भाजपा हार चुकी है। उप्र की 11 सीटों में भाजपा के खाते में छह और सपा के खाते में पांच सीटें आई हैं। वहीं बिहार की आठ सीटों में तीन पर भाजपा, एक पर जदयू, राजद और जनसुराज को एक-एक और निर्दलीयों को 2 सीटें मिली हैं। राजद के लिए यह जीत इसलिए बड़ी है क्योंकि नितिन नबीन के पटना क्षेत्र पर उसने भाजपा को मात दी है। जैसा कि पहले ज़िक्र किया गया, विधानसभा और विधानपरिषद के चुनावों में, एमएलए और एमएलसी की जिम्मेदारियों और अधिकारों में काफ़ी फ़र्क होता है। विधान परिषद् विधानसभा का उच्च और स्थायी सदन है। यानी यह कभी भंग नहीं होता।
विधान परिषद की लगभग एक-तिहाई सीटों पर स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि मतदान करते हैं। इनमें नगर निगम, नगरपालिका और जिला स्तर के संबंधित स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल होते हैं। आम जनता की जगह निर्धारित निर्वाचक मंडल के सदस्य मतदान करते हैं। वहीं विधान परिषद की लगभग एक बटा बारह सीटें स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए होती हैं और लगभग इतनी ही सीटें शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए निर्धारित हैं। इसके अलावा विधान परिषद की लगभग एक तिहाई सीटों पर राज्य के विधायक मतदान करते हैं। विधानसभा के सदस्य एमएलसी उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकता के क्रम में वोट देते हैं। और फिर विधान परिषद के बाकी सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं। संविधान के अनुसार, ऐसे लोगों को साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। स्नातक या ग्रेजुएट एमएलसी चुनाव, विधान परिषद की उन सीटों के लिए होता है जिनमें पात्र और पंजीकृत स्नातक मतदाता अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। इस चुनाव में मतदान करने के लिए व्यक्ति के पास किसी मान्य विश्वविद्यालय की स्नातक डिग्री या नियमों के तहत मान्य समकक्ष योग्यता होनी चाहिए।
संबंधित मतदाता सूची की निर्धारित तारीख से कम-से-कम तीन साल पहले स्नातक की डिग्री प्राप्त की होनी चाहिए। साथ ही व्यक्ति सामान्य रूप से उसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का निवासी होना चाहिए। और संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज होना जरूरी है। वहीं शिक्षक एमएलसी चुनाव, विधान परिषद की उन सीटों के लिए होता है जिनमें निर्धारित शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने का जरूरी अनुभव रखने वाले और मतदाता सूची में पंजीकृत शिक्षक मतदान करते हैं। इसका उद्देश्य शिक्षकों को विधान परिषद में अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर देना है। इस चुनाव में वोट डालने के लिए मतदाता को निर्धारित तारीख से पहले के छह वर्षों के दौरान कुल कम-से-कम तीन साल तक पात्र शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने की योग्यता होनी चाहिए। इसके अलावा व्यक्ति सामान्य रूप से उसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का निवासी होना चाहिए और संबंधित शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज होना जरूरी है। अब आते है कांग्रेस पार्टी की एक नवंबर को प्रस्तावित रैली पर। कुछ व्यापारियों ने राहुल गांधी को पत्र लिख कर कहा की दिवाली के समय ये रैली करने से व्यापार को करोड़ो रुपये का नुकसान होगा।
पहली बात तो कोई भी नुकसान वोट चोरी के नुकसान से बड़ा नहीं हो सकता और दूसरी बात ये व्यापारी तब कहाँ दे जब धरना करके देश की कमर तोड़ दी गई थी और देश के एमएसएमई सेक्टर को सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ और वो आज भी इस नुक़सान से बाहर नहीं आ पाये है। ये व्यापारी वर्ग तब कहा था जब बिना किसी प्लान के एससीएसटी एक्ट लाया गया जो आज भी अमीर दलितों को छोड़ कर किसी को समझ नहीं आता। ये व्यापारी तब कहाँ गए थे जब सवर्णों पर लाठी भाजी जा रही थी। कुल जमा ये है की सिर्फ प्रोपेगंडा फैलाया जा रहा ताकि कैसे भी करके ये लोग सत्ता में बने रहे पर ऐसा होगा नहीं लोग अब पक चुके है। लोगो को बरगलाने के बजाय विपक्ष अपने सत्तर साल और सरकार साढ़े बारह साल में किए अपने काम गिनाए अगर देश में जातिवाद इतनी ही अच्छी है तो उस पर वोट मांगे और सवालों से भागने के बजाय सवालों का जवाब देना सीखे। आप सवर्णों से डरे हुए है ये साफ़ दिख रहा है।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक जौनपुर, यूपी
