सनातन के श्राप से टूटे कई दल, अब पछता रही टीएमसी..!

अनेको-अनेक चुनावों के जरिये भाजपा ने देश के राज्यों में अपना दबदबा बनाया। विपक्ष जब हारता है तो भाजपा पर ठीकरा फोड़ता है और जीतता है तो अपने को इश्लाम का हितैषी साबित करने में लग जाता है उससे यह चूक हुई है कि वह लोकतांत्रिक ढांचे में सवर्ण हिन्दुओं के महत्व को नहीं समझ पाई है। भाजपा इसी सवर्ण हिदुत्व के दम पर आज दहाड़ रही। विश्व में सबसे बड़े सबसे मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था के रुप में भारतीय गणतंत्र को स्थापित किया गया और आज भाजपा उसी लोकतंत्र की सबसे मजबूत धुरी है।
पिछले कुछ वर्षों में देश में चुनावी प्रक्रिया में भारतीय वोटरों ने गठबंधन की राजनीति से अलग होकर पुर्ण बहुमत की सरकार बनाने की जो मुहिम  शुरु की है वह स्वागत योग्य है । हालांकि 1984 तक देश में लगभग हर चुनाव का परिणाम पूर्ण  बहुमत के रुप में आता था। वर्ष 2026 में भी हुए पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए असम, पाण्डिचेरी तथा पश्चिम बंगाल में भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय गठबंधन की सरकार बनी वहीं केरलम् में कांग्रेस गठबंधन तथा तमिलनाडु में नयी नवेले दल टीवीके ने लगभग पुर्ण बहुमत की सरकार बनी। देश में विधायकों के पाला बदलने का खेल नया नहीं है पर महाराष्ट्र में हिंदुत्व से बगावत करने वाली शिवसेना का जो हाल हुआ वही हाल बंगाल में हिंदुत्व से बगावत करने वाली टीएमसी का हुआ है।
अब बड़ा सवाल ये है कि टीएमसी है किसकी..!  काकोली घोष और ऋतबर्थ बनर्जी वाली टीएमसी अगर मूल पार्टी मानी जाएगी तो अभिषेक बनर्जी का क्या होगा ? अगर कानूनी रूप से ऐसा हुआ, तो ममता बनर्जी के पास केवल नाममात्र के 20 विधायक और दोनों सदनों को मिलाकर महज 18 सांसद ही रह जाएंगे जो आगे उनके राजनीतिक महत्वकांक्षा का अंत कर देंगे। यह बगावत तब हुई जब ममता बनर्जी दिल्ली में गठबंधन की राजनीति सेट कर रही थीं, लेकिन पीछे से उनका खुद का घर बिखर गया। कभी बंगाल में अराजकता के सिंहासन पर बैठ एक छत्र राज करने वाली टीएमसी नेता और उनके समर्थक नेताओं का आज जमीन पर निकलना भारी हो रहा है। जनता के गुस्से का आलम यह है कि कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन, अंडे फेंकने और “चोर-चोर” के नारे लगने की खबरें आ रही हैं।
यह हिदुत्व की वही गूज है जिसे मिटाने का दिवास्वप्न देख रही थी ममता। जो बीजेपी को बंगाल से उखाड़ने का दम भरते थे, आज खुद अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे मंदिर – मंदिर घूम रहे। राजनीति का असली ‘खेला’ तो अब शुरू हुआ है आगे-आगे देखिए होता है क्या.? बंगाल में ‘खेला’ हो गया दीदी का किला ढहा, टीएमसी में ऐतिहासिक बगावत ने अखिलेश और डीके शिवकुमार को चिंता में डाल गया है। कहते हैं राजनीति में वक्त बदलते देर नहीं लगती जो ममता बनर्जी कल तक ‘इंडी गठबंधन’ को भाव नहीं देती थीं, बैठकों से दूरी बनाकर रखती थीं और खुद को बंगाल का अजेय क्षत्रप मानती थीं आज समय का चक्र ऐसा घूमा कि वह दिल्ली की बैठक में सबसे पहले पहुंचकर बैठी नजर आईं चेहरे की उदासी बता रही है कि भीतर लगी आग कितनी भयानक है !
पश्चिम बंगाल से जो खबरें आ रही हैं, वो तृणमूल कांग्रेस के वजूद पर ही बड़ा सवालिया निशान लगा रही हैं विधानसभा से लेकर लोकसभा तक महा-बगावत विधानसभा में 60 विधायकों के साथ ऋतबर्थ बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया गया है यह ममता दीदी के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका है…!  दूसरी तरफ, 20 सांसदों के साथ काकोली घोष लगातार सक्रिय हैं लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर अलग गुट बनाने और सदन में अलग बैठने की जगह देने की मांग की गई है जल्द ही इस पर अंतिम मुहर लगने की संभावना है। चुनाव तो हर जगह हुए लेकिन जैसी भगदड़ ममता बनर्जी की टीएमसी में हार के बाद मची हुई है ऐसी भगदड़,ऐसी दुर्दशा आज तक किसी भी हारे हुए राजनीतिक दल की नहीं हुयी थी।इसके पीछे विपक्षी दलों का भारतीय जनता पार्टी को दोष देने के अलावा कोई अन्य रास्ता सुझ नहीं रहा है।
हालांकि इसके पीछे  ममता जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति तथा पश्चिम बंगाल के जनसंख्या के समीकरण को अस्त-व्यस्त करने के लिए बांग्लादेशी एवं रोहिग्या मुसलमानों को प्रश्रय देना सबसे बड़ा कारक है। टीएमसी के सभी हिंदू नेता सांसद विधायक कहीं ना कहीं इस नीति से लगभग आजिज आ चुके थे। रात को जब भी परिवार एवं बच्चों के साथ बैठते रहे होंगे तब परिवार के लोगों के ताने दुत्कार से दो चार होना पड़ता था लेकिन बस में कुछ भी नहीं था तो परिजनों को समय का इंतजार करने के अलावा क्या ही दिलासा देते रहे होंगे ? क्योंकि बगावत करने से पद से हाथ धोने टिकट कटने का खतरा रहता है।जैसे ही 2026 की चुनावी हार पश्चिम बंगाल में हुयी टीएमसी का बुलबुला फुट रहा है। विधायक सांसद ऐसे भाग रहे है जैसे लंगूर के आने से बंदरों में भागम भाग मच जाती है।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

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