वो डरे हुए लोग जो युवाओं और छात्रों को भड़का रहें…….

सड़कों पर उतरा हुआ हर युवा, हर नौजवान  छात्र नहीं था क्यूंकि यह जो कुछ हुआ बीते दिनों यह एक बहुत बड़ी साजिश का रिहलसल था। सौरव दास की मनबढ़ई, जुनैद की बयानबाजी, शहजाद पुनावाला का इस्तीफा, वामपंथी अभिनेताओं की जमात सब केवल इस मुल्क की बर्बादी चाहते है। घर वापस वही लौटता है जो घर से निकला हो  पर जिसे आतंक फैलाने के लिए समाज ने खुल्ला छोड़ा है वैसे पप्पुओं को कोई क्या कहे ? पचास साल की ‘अधिनायकवादी’ हुकूमत में  आरक्षण और सवर्ण स्थिति सुधार की ओर से मुँह मोड़ने वाला हर नेता को आज दलित प्यारा है क्यूंकि सवर्ण हमेशा से चिंतनशील रहा है।बीजेपी,संघ और एनडीए ने अन्य दलों की चूलें हिला दी हैं। भारत में भोगे गए सत्ता के सत्तर साल को भाजपा के चौदह साल ने बेकल कर दिया है। भारत में अहिंसा के एकछत्र शासन को कुछ हिंसावादियों ने कॉकरोच आंदोलन के नाम पर धाराशयी कर दिया। मोदीजी के पच्चीस सालों के लंबे राजनीतिक जीवन में यह पहला अवसर था कि सत्ता की चाहत में नेताओं ने छात्रों के सर पर बंदूक रखवा दिया।  जिस देश को झुकाने में किसानों को साल भर लग गया उस भारत की रीढ़ तोड़ने के लिए नक्सलियो ने छात्र आंदोलन के आड़ में छिपकर भारत के दिल में 36 दिनों में छेद कर दिया। पवित्र सनातन का मज़ाक बनाया, अतिरंजित आत्मविश्वास की नक़ाब कब खिसक गई और परास्त शासन का असली चेहरा मुल्क के सामने कब और क्यों झुका  पता ही नहीं चल पाया। देश स्तब्ध रह गया।
कथित तौर पर कुख्यात एसएफआई नेटवर्क और वामपंथी तंत्र, तकनीकी की मदद से चलने वाले फंडिंग साम्राज्य कि सूंघ तक नहीं पड़ी कि बीस जुलाई को जो मार्च संसद की तरफ़ कूच करने वाला है उसके पेट में उग्रवाद कूट कूट कर भरा है। मोदी विरोध का कितना बारूद समाया हुआ है यह उन ग़ालिबाजो के ज़ुबान से पता चली जो अब सार्वजनिक होकर माफी मांगते दिखाई दे रहें। ऐसे में एक कहावत याद आती है क़ी जब गांव में नहीं गुदा तो क्यों मोदी विरोध में कूदा ! खैर ये सब वो है जिन्हें विपक्ष के लिए फील्डिंग सेट करनी है। विपक्ष  सिर्फ़ मोदी को ही अपना दुश्मन मानकर चल रही जबकि भाजपा ना जाने कितने मोदियों से भरी पड़ी है । देश की जनता अब योगी को अपना हितैषी मानती है । मोदीजी विदेशों में बसने वाले अवसरवादी इण्डियन डायस्पोरा जेन – जी से घबराते तो वो जंतर मंतर तक पहुँच ही नहीं पाते।   संपन्नता क़ी जिंदगी जी रहा आशुतोष रांका, अभिजीत दीपके और सौरव दास को यहाँ आकर विपक्ष के लिए फील्डिंग सेट करनी पड़ी है पर इस बार आगे सपा के युवा गुंडों को किया गया है जो छात्र का छद्म भेष धर कर आराजकता फैला रहें जिसकी खबर यूपी क़ी जनता सहित पूरे देश को है। लोगो में अब कॉकरोचो के प्रति गुस्सा है। जो लोग अपने सपनों का भारत बना कर दिल्ली में अपना शांति वाला सुकून मान बैठे थे वहां तोड़फोड़ कराने वाले सीजेपी गैंग ने चौकीदार को खबरदार कर दिया है। देश के करोड़ों युवा तो असली भारत को आरक्षण और अराजकता के हुकूमत से आज़ाद कराने की तैयारी में जुटे हुए हैं !
सही पूछा जाए तो इस्तीफ़ा धर्मेंद्र प्रधान का नहीं उस पूरी सांसद गैंग का होना चाहिए जो संसद के बाहर सनातन का अपमान कर रहें। राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी, डिंपल यादव,  कल्याण बनर्जी, पप्पू यादव, अवधेस प्रसाद, संजय सिंह जैसों का राजनिती में बने रहना भारत क़ी आंतरिक सुरक्षा को खतरा है। इन्हे वोट देने से पहले अब आपको सौ बार सोचना होगा। तत्कालीन शिक्षा मंत्री संघ से  बन गए है जो अब और पीड़ादायक साबित होगा वामपंथी चाटुकारों के लिए । संघ से नाराज़ यादव क्षत्रपो , जाटवो और मुश्लिमों को भड़काकर, देश में तोड़फोड़ कराने वाले नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकना होगा। भाजपा का निष्काम मार्गदर्शक मंडल दल-बदलुओं की बढ़ती भीड़ को आने दे रहा ताकि नक्सलवाद क़ी कमर टूट जाए जैसे बंगाल में टूटा। इन सबके  बीच हाशियों पर पटके जा रहे समर्पित युवाओं को आरक्षण से राहत मिले तो  राहत की साँस ले। जिस क्षण की उन्हें सालों से प्रतीक्षा है अब उसकी गूंज आरक्षण हटाओ आंदोलन से उठी है। कॉकरोचो के बीच वह मुद्दा भी चुपचाप उपस्थित हो गया। हो सकता है पार्टी अब कुछ मुद्दों पर तानाशाही का खंडहर बनने से बच जाए। लोकतंत्र  का चेहरा अब बदला जाना चाहिये!
वे जो स्पीकर महोदय लोकसभा में ,जो माननीय सभापति (और उपसभापति) राज्यसभा में और जो न्यायपालिका सुप्रीम कोर्ट में विराजमान है सबके संज्ञान में आया होगा कि मुल्क को आरक्षण से भी आजाद कराने क़ी जरुरत है क्यूंकि यह मासूम छात्रों क़ी बलि ले रही। जंतर मंतर पर कॉक्रोचो  की जीत उन मासूम बच्चों के प्रति श्रद्धांजलि नही है जिन्होने इसलिए आत्महत्या की कि उनसे कम अंकधारी उस सीट पर चुन लिए जायेंगे जिस पर उनका हक़ होना चाहिए।  सरकार की इसी भ्रष्ट व्यवस्था के कारण आत्महत्याएँ करना पड़ीं। जंतर मंतर का ख़ाली हो जाना कोई गारंटी नहीं कि सारे आंदोलन अब ख़त्म हो गए हैं अभी सवर्ण जागा है, जो आंदोलन मुल्क के अलग-अलग कोनों में चल रहे हैं उन्हें अब एक नई आवाज़ और साहस मिल गया है ! जो लोग आज सड़कों पर उतर आए वो लौट गए है लेकिन सवर्ण छात्र घरों को वापस लौटने वाला नहीं है। लौटना तो अपनी विधानसभा  में दलों  के उन नेताओं  को होगा जो कुर्सी  को बचाने के लिए मासूम बच्चों और निर्दोष लोगो को सड़क पर उतार दिए। जंतर मंतर का आंदोलन तो उस फ्लॉफ फ़िल्म का सिर्फ़ ट्रेलर मात्र है जिसे हम देशहित में समझकर सपोर्ट कर रहें। विपक्ष ने सेंसर बोर्ड के  ख़ौफ़ से  डिब्बों में बंद करके रखा हुआ था और अब जब पुलिस एक्शन में है तो परते खुल रही और  फ़िल्म अपने आप रिलीज़ हो गई।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

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