व्यंग्य : बब्बन भैया का निष्कासन निंदा के दायरे में है…..!

दलगत राजनीति भी अजीब बला है। यह राजनीति वह दुल्हन है जिसकी शादी तो नेता जी से होती है पर लोकलाज के कारण नेता जी इसकी विदाई नहीं करा पाते। अब बीजेपी वाले अपने बब्बन नेता को ही देख लीजिए, बेचारे खांमखा बलि का बब्बर शेर बन गए। बब्बन को लेकर मेरे विचार अन्य लोगों से पूरी तरह भिन्न है। उनके रसिक अभिलाषा का घोर अपमान हो रहा। मन की इक्षा को मार कर यदि इंसान मजा ले तो वो मजा भी क्या मजा ! बब्बन दादा को लेकर लोग जो थू –थू कर रहे हैं, आशा है  मेरा यह ब्ला वाला उबला लेख पढ़ने के बाद उन लोगों की आत्मा उन्हें धिक्कार उठेगी ! उनकी छठी इन्द्रिय के घोंसले में बैठी चेतना जागृत होगी और दृष्टिकोण पूर्णतः परिवर्तित हो जाएगा। बब्बन दादा को  निष्कासित करना गलत और बिना सिर पैर का काम है। कल्पना कीजिए कि एक नृत्यअंगना भरी डीजे सभा में अनवरत देह घर्षण से एक क्षत्रिय को उकसा रही हो ! उधर डीजे वाला गाने में आज की रात मजा हुश्न का के साथ पाण्डेय जी का बेटा हूँ चला रहा हो !  साथी मित्र कह रहें हो भूल जा बब्बनवा की तू यार सीनियर लीडर है। जाम टूटा जा रहा हो और वह वीर नृत्य रसिक क्षत्रिय निष्क्रिय पड़ा रहे तो क्षत्रिय समाज की प्रतिष्ठा पर कितनी ठेस पहुंचेगी ? यही घटना एक समय किसी मिशिर जी के महफिल में घटी थी और तब मिसिर जी लोक लाज के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहें थे इतने में नृत्याअंगना के सब्र का बांध टूट गया और उसने गाना बना दिया कि ’मिसिर जी तू त बाड़ बड़ा ठंडा’ तो क्या आज हमारा क्षत्रिय समाज यह सहन कर पाता की उसपर भी इसी तरह का एक बौद्धिक  टाईप का  सांग बन जाता कि बाबू साहब तू बाड़ बड़ा ठंडा ? वैसे भी एक ठंडा क्षत्रिय किस काम का ?
अतः आदरणीय बब्बन जी ने अपनी तप्त प्रतिक्रिया से क्षात्र–ताप के बैनर तले नृत्यॉँगना के साथ रस तृप्ति कर ली। पहली मुख्य बात तो यह कि आज की नेतागिरी में  एक विडंबना है कि राजनीति और राजनीतिक हस्तियों में पारदर्शिता का घोर अभाव हो चुका है। बब्बन नेता का भारतीय राजनीति में होना इस बात की आश्वस्ति है कि पारदर्शिता किसी न किसी रूप में जीवित है। वे उन आडंबरी नेताओं में से नहीं हैं, जो होते तो घोर  कुकर्मी हैं लेकिन सार्वजनिक जीवन में अपने सत्कर्मों का ढोल पीटते रहते हैं। दिन में  लंगर चलवाते है, रात में फीता काटते है । इनके उलट बब्बन जी जैसे अंदर हैं वैसे ही बाहर हैं। कहीं कोई कृत्रिमता नहीं, कहीं कोई उराव दूराव छिपाव नहीं । दूसरा मुख्य पहलू यह कि राजनीति में ऊर्जावान लोगों का अभाव है। कभी हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि मैं आयु के इस पड़ाव पर भी बीस वर्ष के नौजवान सी ऊर्जा रखता हूं। तो आदरणीय नेता जी ने भी अपनी क्रियाशीलता से यही सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ऊर्जा के मामले में वह भी किसी नौजवान से रत्ती भर कम नहीं फिर उनका निष्कासन क्यों ! तीसरी बात यह कि एक गाने के माध्यम से हमेशा हम मिसिर लोगों पर लांछन लगाया जाता है कि ’मिसिर जी तू त बाड़ बड़ा ठंडा’। चूंकि मिसिर जी लोग ब्राह्मण होते हैं इसलिए ठंडा होने का आरोप वे सहन कर जाते हैं पर एक राणा वंशज यह कैसे सहन कर पाता इसलिए बब्बन भैया का पूर्ण समर्थन। ऐसे दिव्य पुरुष को मैं पार्टी से निष्कासित किए जाने की कड़ी निंदा करता हूँ । नेता समाज को अपने बब्बन भैया के समर्थन में आगे आना चाहिए और व्यक्तिगत तौर पर नड्डा साहब समेत उन तमाम क्षत्रिय नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि तन तृप्ति गुनाह किस संविधान के किस आर्टिकल के तहत है ! या हम मिसिर लोगो अथवा अहिरान चरमान बबुआन कहने वालों के हवाले ही तन तृप्ति जायज है।
पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक एवं व्यंग्यकार जौनपुर यूपी 

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