भावनानी के व्यंग्यात्मक भाव – आदत है शासकीय कर्मचारी हूं

लेखक चिंतक कवि एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
दो मिनट के काम को घंटों लगाना पड़ता है
जनता को दिनोंदिन घुमाना पड़ता है
काम बिना मतलब अड़ाके बोलना पड़ता है
आदत है शासकीय कर्मचारी हूं
फाइल मेरे पास है काम हो गया है
त्रुटियां कुछ नहीं है काम ओके है
हरे मिले नहीं बोलना पड़ता है
आदत है शासकीय कर्मचारी हूं
मुझे मालूम है साहब नहीं है
काम लटकाया जाता है
जनता शिकायत करे तो बोलना पड़ता है
आदत है शासकीय कर्मचारी हूं
साहब के निर्देश का झूठ बोलना पड़ता है
हिस्सापत्ती बांटना पड़ता है
ऊपरतक सेटिंग है तो बिंदास बोलना पड़ता है
आदत है शासकीय कर्मचारी हूं
जनता को दिखाने साहब की डांट खाना पड़ता है
हरे गुलाबी चटकाना पड़ता है
जनता को घुमा घुमाकर बोलना पड़ता है
 आदत है शासकीय कर्मचारी हूं

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