अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्यों नजर आ रहे हैं बदले-बदले से

अमेरिका वर्ष 1990 में रूस के विघटन के पश्चात विश्व की एकमात्र शक्ति बनकर उभरा और उसने लगभग तीन दशकों तक दुनिया पर एक छत्र अपने नाम का  सिक्का डालर चलाया किंतु वर्तमान समय में अमेरिका के समक्ष उसके डॉलर को चुनौती मिल रही है। जिससे अमेरिकी शक्ति चाहे वह भू राजनीतिक हो या आर्थिक हो उस पर प्रभाव पड़ना प्रारंभ हो चुका है। क्योंकि चुनाव पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन मागा का नारा दिया था और वह उसी के अनुसार कार्य करना चाहते हैं अर्थात अमेरिकी प्रभुत्व की स्थापना करना चाहते हैं। इसीलिए वह इतना आक्रमक है परंतु दूसरी ओर दुनिया डॉलर के प्रभाव से मुक्ति चाहती है।
इसका प्रमुख कारण यह है कि यदि आप डॉलर में व्यापार करते हैं तो आपको अमेरिका की अनावश्यक शर्तों को भी मानना पड़ता है और नहीं मानते हैं तो आपको अमेरिका वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से बाहर कर देता है और आपकी अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। वर्ष 1970 में अमेरिका के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब के किंग के साथ एक समझौता किया कि वह तेल का व्यापार अमेरिकी डॉलर में करेंगे। तब से अमेरिकी डॉलर का  वैश्विक अर्थव्यवस्था पर वर्चस्व स्थापित होना प्रारंभ हो गया। किंतु चीन का अमेरिका के साथ व्यापार जब अमेरिका के राष्ट्रपति  बराक ओबामा थे। तो चीन के पक्ष में हुआ तो चीन ने  चीनी मुद्रा युवान में व्यापार करने की बात कही।
इसी प्रकार चीन ने अपने साझेदार देशों जिनसे चीन के अच्छे  संबंध है उनसे उसने युवान में व्यापार करनेआग्रह किया। जिसमें वेनेजुएला भी शामिल था। रूस का जब यूक्रेन से युद्ध शुरू हुआ तो रूस पर अमेरिका ने व्यापारिक प्रतिबंध लगाया रूस ने अपनी मुद्रा रूबल में अपने साथियों से व्यापार करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार भारत ने रुपए में व्यापार को प्राथमिकता दिया तथा रूस के साथ रुपए में तेल का आयात किया। यूएई के साथ रुपए में व्यापार का समझौता किया। इसके साथ भारत ने यूपीआई पेमेंट को भी विदेशों में बढ़ावा दिया। जिसमें मुख्य रूप से सिंगापुर, थाईलैंड हैं में बढ़ावा दिया। जिसने डॉलर के समक्ष चुनौती पेश की। डोनाल्ड ट्रंप को आशंका है कि ब्रिक्स देश अपनी अलग मुद्रा ला सकते हैं इसीलिए उन्होंने ब्रिक्स देशों पर अपनी मुद्रा  लाने पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की धमकी दी है।
डीडालराइजेशन से अमेरिका को सबसे बड़ा नुकसान उसकी आर्थिक शक्ति कमजोर होगी। जिससे उसकी सैन्य शक्ति कमजोर होगी। सैन्य शक्ति कमजोर होने पर उसका भू राजनीतिक प्रभाव कम होगा और फिर अमेरिका सुपर पावर नहीं रह जाएगा। डी डॉलराइजेशन से विश्व के अनेक देशों को क्या फायदा होगा? तो सबसे बड़ा फायदा अमेरिका की दादागिरी से मुक्ति मिलेगी। नए शक्ति संतुलन स्थापित होंगे तथा बहू ध्रुवीय विश्व व्यवस्था स्थापित होगी और भारत जैसे देशों को फायदा होगा।
बाल गोविन्द साहू (लेखक) – कानपुर 

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