असम विधानसभा ने बुधवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक, 2026 पारित कर दिया। भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने सोमवार को यह विधेयक सदन में पेश किया था। इसके साथ ही असम पूर्वोत्तर का पहला और उत्तराखंड एवं गुजरात के बाद भाजपा शासित तीसरा राज्य बन गया है जिसने इस विधेयक को पारित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। विधेयक विपक्ष के हंगामे के बीच पारित हुआ, जिसने इसे चयन समिति को भेजने की मांग की है।
राज्य सरकार के अनुसार, विधेयक में नियमों का पालन न करने पर दंड का भी प्रावधान है, जिसके तहत निर्धारित अवधि के भीतर विवाह या तलाक का पंजीकरण न कराने पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बुधवार को दावा किया कि कांग्रेस ने 1925 में ही समान नागरिक संहिता की वकालत की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल अब धर्मनिरपेक्ष नहीं रहा और एक विशेष समुदाय का प्रतिनिधि बन गया है।
‘असम, 2026 विधेयक’ पर चर्चा के दौरान पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून संविधान के अनुच्छेद 44 पर आधारित है, न कि भाजपा या आरएसएस की किसी विचारधारा पर, जैसा कि विपक्ष ने आरोप लगाया है। सरमा ने कहा कि समान नागरिक संहिता का लंबा इतिहास है। इसकी मांग सबसे पहले कांग्रेस ने 1925 में की थी। जवाहरलाल नेहरू ने भी 1937 में इसका सुझाव दिया था। वही कांग्रेस अब कुरान और शरीयत के नजरिए से इसका विरोध कर रही है, न कि हिंदू, ईसाई या आदिवासी नजरिए से।
उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस यूसीसी का विरोध कर रही है। उनकी विधानसभा संरचना से यह साबित होता है कि वे सभी जातियों, पंथों और धर्मों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं, बल्कि केवल एक विशिष्ट समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। कांग्रेस असम के भौगोलिक स्वरूप का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।
