समाज में राम जी के इंसान, कांग्रेस के कॉकरोच, योगी जी के सांड और सपा की टोटी के बहुत चर्चे है। वैसे देखा जाए तो यह थ्योरी बिल्कुल सरल है। स्लाइम मोल्ड, जो एककोशिकीय जीव है, बिना दिमाग के भूल-भुलैया में सबसे छोटा रास्ता निकाल लेता है। उसे याद रहता है कि कहां जा रहा है। छुई-मुई का पौधा बार-बार छुए जाने पर डरना बंद कर देता है – वो सीखता है कि खतरा नहीं है। क्या इंसानों वाला एनेस्थीसिया देने पर वीनस फ्लाईट्रैप ने शिकार पकड़ना बंद कर दिया, नहीं ना ! वह जब होश में आया तो फिर पकड़ने लगा। यानी प्रकृति ने चेतना को सिर्फ खोपड़ी में बंद नहीं किया अपितु उसे आपके जीन में डाला है और जिसका जैसा जीन उसका वैसा व्यवहार। कांग्रेस के जीन पर संदेह नही पर राहुल के जीन में संदेह लाजमी है। और दूसरी तरफ वो हैं भाजपा समर्थक जिन्हें 56 इंची सीने वाला मानव बोला जाए तो – 1400 ग्राम के दिमाग वाले मनुष्य उबाल खा जाते है , जिनमें एथिकल कंस्यूशियसनेस गायब है वो आजकल लेफ्टी हो गए है । प्रकाश राज और नासिरुद्दीन साहब ऐसे ही एथिकलेस ह्यूमन बिइंग है तो सवाल यह है कि पौधे में चेतना सही है तो इंसानो कि चेतना का क्या हुआ.? हममें नैतिकता क्यों नहीं? क्या चेतना केवल शासन है, या चयनात्मक थिंकिंग है ? या भगवान राम ने इसे सर्वजीव के निमित्त बनाया है!
विज्ञान कहता है :- कंस्यूशियसनेस इज नॉट वन थिंग टू अंडरस्टैंड विथाउट नेचर ….
पौधे में सर्विवल कंस्यूशियसनेस होती है वह रोशनी, खतरा, याददाश्त सब पकड़ लेता है। इंसान में वही सब आजकल मिसिंग है । साथ में एक और चीज़ है सेलेक्टिव एथिकल कंस्यूशियसनेस । हम जानते हैं कि क्या गलत है, पर हम तय करते हैं कि किसके लिए गलत है। अपने कुत्ते के लिए हमारे पास दया है, सड़क के कुत्ते के लिए अपशब्द, अपनी जाति सर्वोत्तम औरो की जाति मनुवादी लगती है , अपनी पार्टी ईमानदार दूसरी भ्रस्ट नजर आती है , अपने समुदाय के लिए न्याय है, दूसरे के लिए कॉकरोच दीमक । पौधा भेद नहीं करता, इंसान करता है। इसीलिए बिना दिमाग वाला जीव ज्यादा ईमानदार लगता है। तकनीकी रूप से आजकल कोर्ट ट्रायल प्रिपरेशन और एटेम्पट में फर्क रहा है। पर यही तो समस्या है, कानून में ! यहाँ तकनीक है, पर चेतना में करुणा होनी चाहिए। जब एक महिला का मुंह दबाया जाता है, तो पीड़ित के लिए वो प्रिपरेशन नहीं, आतंक है। जब एक सवर्ण गरीब का हक़ काटकर अमीर दलित को दिया जाता है तो यह कानूनन अंधापन है। कानून की किताब में धारा बदल जाने से गरीबी का अनुभव नहीं बदलता। यहां इंसान के पास दिमाग है, कानून है, भाषा है – पर उस चेतना का आभाव है। हर जगह खुद को रखने की एथिकल कंस्यूशियसनेस नहीं है। स्लाइम मोल्ड के पास दिमाग नहीं, पर वो रास्ता भूलता नहीं। हमारे पास दिमाग है, पर हम दूसरे का दर्द भूल जाते हैं। एनेस्थीसिया का असली प्रयोग कहां हो रहा है? रिसर्च कहती है – एनेस्थीसिया देने पर पौधा सो जाता है।
इंसानों पर एनेस्थीसिया कौन दे रहा है? सत्ता दे रही है वो कॉकरोच हैं कहकर। ताकि दया सो जाए। सोशल मीडिया दे रहा है – हर दिन नफरत की खुराक देकर। ताकि गिल्ट सो जाए। धर्म और जाति का अहंकार दे रहा है – हम श्रेष्ठ हैं कहकर। ताकि बराबरी सो जाए। पौधा एनेस्थीसिया से जाग जाता है। इंसान जागना ही नहीं चाहता। क्योंकि जागने पर उसे मानना पड़ेगा कि जो वो दूसरों के साथ कर रहा है, वो गलत है। अगर हम चेतना को सिर्फ अपने जैसा खोजेंगे, तो हम चूक जाएंगे। पौधे हमें बता रहे हैं – चेतना के लिए दिमाग नहीं, संवेदनशीलता चाहिए। और हम इंसान बता रहे हैं – दिमाग होने से नैतिकता नहीं आती। नैतिकता तब आती है जब तुम दूसरे जीव को भी अपने जैसा महसूस करो। बिना दिमाग वाले जीव में आज भी चेतना है, क्योंकि उसे अभी तक ये नहीं सिखाया गया कि किसे इंसान मानना है और किसे कीड़ा। सिर्फ त्योहार नहीं, भारत के सामाजिक ताने-बाने का आधारनहीं यह व्रत और त्योहार नवरात्र के दो अंतिम दिन – महानवमी और विजयदशमी को हम अक्सर सिर्फ पूजा और रावण दहन तक सीमित कर देते हैं। जबकि अगर गहराई से देखें तो ये दोनों दिन भारत के सामाजिक समीकरण, नारी शक्ति, किसान चेतना और सामूहिक एकता के सबसे बड़े पर्व हैं। महानवमी – नारी सशक्तिकरण का पहला सामाजिक आंदोलन।
महानवमी के दिन होने वाला कन्या पूजन दुनिया का सबसे पुराना वीमेन एपावरमेंट प्रोग्राम है। इसका सामाजिक महत्व क्या है ? बेटी को देवी मानने की सीख देने वाला त्योहार जिस समाज में आज भी बेटियों को बोझ समझा जाता है, हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले नियम बनाया कि साल में दो बार 9 कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोकर भोजन कराओ। यह एक मनोवैज्ञानिक क्रांति थी हर घर के पुरुष को झुककर एक छोटी बच्ची के पैर छूने पड़ते हैं। इससे अहंकार टूटता है और बेटी के प्रति सम्मान का बीज बचपन से पड़ता है। जात-पात से ऊपर है मनुवाद जहाँ कन्या पूजन में कन्या की जाति नहीं पूछी जाती। ब्राह्मण के घर दलित की बेटी भी देवी बनकर पूजी जाती है। यह सामाजिक समरसता का सबसे सुंदर उदाहरण है। साझा अर्थव्यवस्था जहाँ महानवमी के हवन में पूरे मोहल्ले का अनाज, घी, लकड़ी एक जगह आता है। यह कम्युनिटी किचन का रूप है जो बताता है कि त्योहार जातिवाद नहीं, मिलकर मनाया जाता है। विजयदशमी भी किसान, श्रमिक और न्याय का पर्व को हम सिर्फ रामलीला से जोड़ते हैं, पर इसका असली सामाजिक नायक किसान और कारीगर है। शमी पूजन किसान का थैंक यू भी इन त्योहारों को कि विजयदशमी पर शमी के पेड़ की पूजा होती है ? शमी एक ऐसा पेड़ है जो सबसे कठिन सूखे में भी हरा रहता है और उसकी पत्तियां खाद का काम करती हैं। किसान आज के दिन अपने हल, खुरपी और ट्रैक्टर की पूजा करता है। यह भारत का लेबर डे है – अपने औजारों को धन्यवाद कहने का दिन। एक कॉर्पोरेट ऑफिस में लैपटॉप की पूजा हो या एक बढ़ई द्वारा अपनी आरी की, यह श्रम का सम्मान है।
शस्त्र पूजन नहीं, स्किल पूजन: आज के दिन क्षत्रिय तलवार तो ब्राह्मण कलम की पूजा करता था। आज की भाषा में यह स्किल रेस्पेक्ट है। एक अध्यापक की किताब, एक डॉक्टर का स्टेथोस्कोप, एक वकील की किताबें ही उसके शस्त्र हैं। विजयदशमी हमें सिखाती है कि जिस हुनर से तुम्हारा घर चलता है, साल में एक बार उसे भी प्रणाम करो। रावण दहन भी अनूठा रहस्य है। सामाजिक बुराइयों का पुतला है। रावण के 10 सिर केवल उसके नहीं, समाज की 10 बुराइयों के प्रतीक हैं। जातिवाद, 2. दहेज, 3. नशा, 4. भ्रष्टाचार, 5. महिला हिंसा, 6. बाल श्रम, 7. अशिक्षा, 8. पर्यावरण विनाश, 9. अंधविश्वास, 10. घृणा। जब पूरा गांव मिलकर एक बड़ा रावण बनाता है और जलाता है, तो वह एक सामूहिक शपथ लेता है कि हम इन बुराइयों को अपने गांव में नहीं रहने देंगे। यह एक पब्लिक अवेयरनेस कैंपेन है जो बिना सरकारी खर्च के हजारों सालों से चल रहा है। आप सभी को महानवमी और विजयादशमी की शुभकामनायें।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक जौनपुर यूपी
