सीओ मैडम के “कानून का गंदा खेल”: जनता पर सख्ती, पुलिस पर रहम

राजेंद्र केशरवानी
उन्नाव। “कानून सबके लिए समान है” — यह नारा तो हर पुलिस चौकी, हर सरकारी दफ्तर और हर जनसभा में गूंजता है। मगर उन्नाव के सीओ कार्यालय के बाहर का नजारा इस दावे की पोल खोल रहा है। यहां “पुलिस” लिखी बिना नंबर प्लेट वाली गाड़ियां खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं, और सीओ मैडम की सख्ती का डंडा सिर्फ आम जनता तक ही सीमित नजर आता है। नंबर प्लेट गायब, “पुलिस” लिखकर नियमों को ठेंगा! हाल ही में सीओ उन्नाव ने एक पत्रकार की गाड़ी सिर्फ इसलिए सीज कर दी, क्योंकि उसकी नंबर प्लेट आंशिक रूप से मिट गई थी। नियमों की यह सख्ती तारीफ-ए-काबिल थी, मगर अब उसी सीओ ऑफिस के बाहर खड़ी दर्जनों बाइकों का सच सामने आया है। इन बाइकों पर नंबर प्लेट की जगह बस “पुलिस” लिखा है, मानो यह शब्द कानून से ऊपर का पासपोर्ट हो, ये वाहन दिनभर कार्यालय के बाहर खड़े रहते हैं, और न कोई सवाल, न कोई कार्रवाई।
 क्या पुलिस का यह “खास स्टेटस” नियमों से छूट का लाइसेंस बन गया है ?
सीसीटीवी की आंखें, मगर कार्रवाई कुंभकर्णी नींद मे है सीओ कार्यालय के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे इस नंगे उल्लंघन के मूक गवाह हैं। कैमरे तो दिन-रात सच रिकॉर्ड करते हैं, मगर सवाल यह है कि क्या इन फुटेज को देखने की हिम्मत कोई दिखाएगा? अगर कानून का डंडा चलाना है, तो शुरुआत अपने घर से क्यों न हो? आखिर, जब बात नियमों की हो, तो पुलिस और जनता में भेदभाव क्यों ?
जनता के सवाल, जो गूंज रहे हैं सड़कों पर
क्या “पुलिस” लिखने से नंबर प्लेट की जरूरत खत्म हो जाती है? सीओ मैडम की सख्ती सिर्फ आम आदमी के लिए, अपने कर्मचारियों के लिए नहीं? क्या कानून की किताब में पुलिस वालों के लिए अलग पन्ना छपा है?
निष्पक्षता का इम्तिहान, सीओ मैडम की अग्निपरीक्षा
यह मामला सिर्फ बिना नंबर प्लेट की गाड़ियों का नहीं, बल्कि प्रशासन की विश्वसनीयता और निष्पक्षता का है। जब आम जनता पर नियमों का हंटर चलता है, तो पुलिस वालों को “पुलिस” लिखकर छूट क्यों? अगर सीओ मैडम को सचमुच कानून का पाठ पढ़ाना है, तो शुरुआत अपने दफ्तर के बाहर खड़ी इन बाइकों से करनी होगी। अब सबकी नजरें सीओ उन्नाव पर टिकी हैं उन्नाव की जनता और सोशल मीडिया पर अब सवालों का तूफान उठ रहा है। क्या सीओ मैडम इस खुले उल्लंघन पर एक्शन लेंगी, या यह मामला भी “अंदरखाने” की छूट में दब जाएगा? क्या कानून का डंडा सिर्फ जनता के लिए है, या पुलिस भी इसकी जद में आएगी? जवाब का इंतजार उन्नाव की गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक बेसब्री से हो रहा है। कानून का असली चेहरा कब दिखेगा? यह वक्त है कि सीओ उन्नाव न सिर्फ अपनी सख्ती का परचम लहराएं, बल्कि यह भी साबित करें कि कानून की नजर में कोई छोटा-बड़ा नहीं। अगर “पुलिस” लिखी गाड़ियां नियम तोड़ सकती हैं, तो फिर जनता से नियम पालन की उम्मीद कैसे? अब गेंद सीओ मैडम के पाले में है — क्या वे इस दोहरे रवैये को खत्म करेंगी, या यह कहानी भी “पुलिस की गाड़ी, पुलिस का नियम” बनकर रह जाएगी? उन्नाव की सड़कों से उठा यह सवाल अब हर उस शख्स की जुबान पर है, जो कानून की निष्पक्षता में यकीन रखता है।

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