धरा रह गया एजुकेशन मॉडल, फेल हो गया मोहल्ला क्लीनिक…

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे शनिवार को घोषित हो गए और जैसा कि एग्जिट पोल में अनुमान लगाया गया था ठीक वैसा ही हुआ. बीजेपी 27 साल बाद राजधानी में सरकार बनाने जा रही है. बीजेपी 47 और आम आदमी पार्टी 23 सीटों पर आगे चल रही है. कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला है. अरविंद केजरीवाल नई दिल्ली सीट, सत्येंद्र जैन शकूर बस्ती और मनीष सिसोदिया जंगपुरा सीट से चुनाव हार चुके हैं. सौरभ भारद्वाज ग्रेटर कैलाश से पीछे चल रहे हैं. जबकि आतिशी को कालकाजी सीट पर जीत मिली है.

आम आदमी के मुद्दों को उठाकर 2015 में आम आदमी पार्टी 67 सीटें जीतकर दिल्ली की किंग बनी थी. बीजेपी समेत कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था. 2020 के चुनाव में भी कमोबेश पिक्चर ऐसी थी. केजरीवाल की पार्टी ने 62 सीटें जीती थीं और बीजेपी को 8 सीटों से संतोष करना पड़ा था. आम आदमी पार्टी ने हमेशा दावा किया है कि उसके राज में मुफ्त बिजली-पानी, मोहल्ला क्लीनिक और स्कूलों की स्थिति बेहतर हुई है. लेकिन 10 साल में ही अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी अर्श से फर्श पर कैसे आ गई, अब यह सवाल उठ रहा है.

दरअसल आप के दूसरे टर्म में उस पर भ्रष्टाचार, शराब घोटाला और शीशमहल बनाने जैसे आरोप लगे. वहीं यमुना में गंदगी का मुद्दा बीजेपी ने जोर-शोर से उठाया, जिसे काउंटर करने में आम आदमी पार्टी फेल रही. साल 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराकर अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने थे. तब उनको 25000 वोट मिले थे. इसके बाद 2015 में उन्होंने बीजेपी की नुपूर शर्मा को 31000 वोटों से मात दी थी. 2020 में बीजेपी के सुनील यादव को उन्होंने 21000 वोटों से हराया था.

लेकिन इस बार उनको खुद करारी शिकस्त मिली. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी इस बार लोगों का मूड और दिल्ली के अन्य मुद्दों को हल कर पाने में भी नाकाम रही. दूसरे टर्म में ज्यादातर राजनीति वार-प्रतिवार पर केंद्रित रही.

केजरीवाल और उनके मंत्रिमंडल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे.खास तौर से शराब नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया था, जिसने उनकी साख पर सवाल उठाए. इसके अलावा ”शीशमहल” के वीडियोज भी जमकर वायरल हुए, जिससे उनकी आम आदमी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा. लोग अरविंद केजरीवाल से उनके किए गए स्वच्छ पानी, स्वच्छ सड़कें और सीवर समस्या हल ना कर पाने से भी नाराज थे. कई बार लोगों ने उनको वादाखिलाफी के लिए जिम्मेदार ठहराया. एलजी और केंद्र सरकार के साथ उनकी रोजमर्रा की नोकझोंक ने पार्टी के तौर-तरीकों पर सवाल उठाया. अब आप के हालात ऐसे हैं कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन चुनाव हार चुके हैं. अन्य बड़े नेता भी हार की कतार हैं. देखना यह होगा कि इस करारी हार से आम आदमी पार्टी क्या सबक लेती है.

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