मोदी सरकार 12 साल में तीसरी बार झुकी?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उस राजनीतिक दबाव का प्रतीक बन गया है जिसने केंद्र की मोदी सरकार को पिछले 12 वर्षों में तीसरी बार जनआंदोलन के सामने पीछे हटने पर मजबूर किया। इससे पहले नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानि सीएए और एनआरसी के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन तथा तीन कृषि कानूनों के विरोध में चले किसान आंदोलन ने भी सरकार को अपने कदम वापस लेने के लिए विवश किया था। वहीं, यदि नीतिगत मामलों से अलग सामाजिक दबाव की बात करें तो यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद जनदबाव में विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर का इस्तीफा भी इसी क्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।

इन सभी घटनाओं में एक समान राजनीतिक प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। मोदी सरकार शुरुआती दौर में विरोध को कमतर आंकती है, आंदोलन की नैतिक शक्ति को स्वीकार करने से बचती है और तब तक अपने रुख पर कायम रहती है, जब तक विरोध की राजनीतिक कीमत पीछे हटने की कीमत से अधिक नहीं हो जाती। यही पैटर्न इस बार भी देखने को मिला, जब प्रश्नपत्र लीक के मामलों से नाराज छात्रों और युवाओं का आंदोलन लगातार फैलता गया और अंततः शिक्षा मंत्री को पद छोड़ना पड़ा।

सबसे पहला बड़ा उदाहरण नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजी को लेकर सामने आया था। उस समय केंद्रीय गृह मंत्री लगातार देशव्यापी नागरिक पंजी लागू करने की बात कर रहे थे और इसकी पूरी प्रक्रिया का सार्वजनिक उल्लेख भी कर चुके थे। लेकिन व्यापक विरोध प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री ने स्वयं यह कहा कि सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक पंजी लागू करने का कोई निर्णय नहीं लिया है। औपचारिक रूप से कोई अधिसूचना वापस नहीं ली गई, क्योंकि पूरे देश में इसे लागू करने की घोषणा ही नहीं हुई थी, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह स्पष्ट संकेत था कि सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं और यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।

दूसरी बार सरकार को किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन के सामने झुकना पड़ा था। लगभग एक वर्ष तक चले आंदोलन के दौरान सरकार ने शुरुआत में यह मानकर रणनीति बनाई कि आंदोलन सीमित क्षेत्र तक सिमट जाएगा और समय के साथ समाप्त हो जाएगा। आंदोलन को राजनीतिक रंग देने और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की भी कोशिश हुई, लेकिन किसानों ने अपना संघर्ष जारी रखा। अंततः प्रधानमंत्री ने स्वयं तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की और किसानों से क्षमा भी मांगी। यह मोदी सरकार की ऐसी दुर्लभ स्वीकारोक्ति थी जिसमें स्पष्ट दिखा कि लगातार बने जनदबाव के सामने उसे पीछे हटना पड़ा।

अब शिक्षा मंत्रालय और प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर हुआ आंदोलन इस क्रम की तीसरी बड़ी घटना बनकर उभरा है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्वरूप रहा। यह किसी एक संगठन, राजनीतिक दल या स्थापित नेतृत्व के नियंत्रण में नहीं था। यह स्वतःस्फूर्त, विकेंद्रित और युवाओं द्वारा संचालित आंदोलन था, जिसमें भीड़ ही नेतृत्व भी थी और आवाज भी। यही कारण रहा कि सरकार पारंपरिक राजनीतिक वार्ता की रणनीति नहीं अपना सकी, क्योंकि बातचीत के लिए कोई एक ऐसा चेहरा मौजूद नहीं था जिससे समझौता कर आंदोलन समाप्त कराया जा सके।

युवाओं ने सोशल मीडिया के जरिए आंदोलन को नई ऊर्जा दी। व्यंग्य, हास्य और रचनात्मक संदेशों से भरे छोटे वीडियो और चित्रों ने आंदोलन को व्यापक सांस्कृतिक पहचान दी। यह प्रचार सरकारी संदेशों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी साबित हुआ। आंदोलन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन उसका समन्वय मजबूत था और उसका विस्तार इतना तेज था कि सरकार की प्रतिक्रिया उसके मुकाबले धीमी पड़ गई।

20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई भी आंदोलन को रोकने की बजाय उसे और मजबूत करने वाली साबित हुई। सामान्यतः सरकारें ऐसे आंदोलनों से निपटने के लिए नेतृत्व को निशाना बनाती हैं, विरोधी समूहों में विभाजन पैदा करती हैं या समय के साथ आंदोलन के कमजोर पड़ने का इंतजार करती हैं। लेकिन इस बार युवाओं का आंदोलन इन सभी पारंपरिक राजनीतिक उपायों से काफी हद तक अप्रभावित दिखाई दिया। यहां तक कि जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपना रुख नरम किया, तब भी छात्रों ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग जारी रखी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि आंदोलन किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं था।

भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी इस आंदोलन को लेकर असहजता का माहौल बताया जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि आंदोलन में बड़ी संख्या उन छात्रों और युवाओं की रही जो मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग से आते हैं तथा जिन्हें पार्टी का पारंपरिक सामाजिक आधार माना जाता है। राजनीतिक विरोधियों के आंदोलनों को सरकार अक्सर वैचारिक या दलगत कहकर खारिज कर सकती है, लेकिन जब असंतोष अपने ही समर्थक वर्ग के बीच दिखाई देने लगे तो उसे नजरअंदाज करना कहीं अधिक कठिन हो जाता है। यही कारण है कि मोदी सरकार को पहली बार यह एहसास हुआ कि व्यवस्था के प्रति नाराजगी केवल विपक्षी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन तीन बड़े आंदोलनों ने केंद्र सरकार की कार्यशैली का एक व्यापक स्वरूप भी सामने रखा है। सरकार एजेंडा तय करने, राजनीतिक पहल अपने हाथ में रखने और शक्ति प्रदर्शन की राजनीति करने में दक्ष दिखाई देती है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले लोकतांत्रिक असहमति के साथ लगातार संवाद बनाए रखने में अक्सर कठिनाई महसूस करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह तर्क और संवाद की अपेक्षा राजनीतिक दबाव बढ़ने के बाद ही अपने रुख में बदलाव करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार खतरे की तीव्रता पर अधिक प्रतिक्रिया देती है, जबकि शुरुआती असहमति को गंभीरता से लेने में संकोच करती है।

हालांकि, सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। उनका दावा है कि सरकार युवाओं में व्याप्त नाराजगी को कम करना चाहती है, जबकि केवल इस्तीफे को समस्या का स्थायी समाधान नहीं मानती। सरकार का कहना है कि छात्रों से जुड़े सभी मुद्दों के समाधान के लिए वह प्रतिबद्ध है और आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

बहरहाल, फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नागरिकता संशोधन कानून, कृषि कानून और प्रश्नपत्र लीक जैसे तीन बड़े आंदोलनों ने यह साबित किया है कि व्यापक, लगातार और संगठित जनदबाव आज भी लोकतांत्रिक राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी बदलते राजनीतिक समीकरण का ताजा और महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है।

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