यहां लाश मांगती है पैसा! करती रहती है इंतजार… नहीं देने पर होता है ये अंजाम

भारत प्रथाओं का देश है. यहां कई प्रथाएं ऐसी हैं जो कई सौ सालों से चली आ रही हैं. लगभग सभी समाजों में बड़े-बुजुर्ग प्रथा को कानून की तरह मानते हैं. भारत ही नहीं कई अन्य देश के कई समाज भी प्रथाओं पर ही किसी विषय का निर्णय लेते हैं. समय के साथ कुछ रीति-रिवाज खत्म होने की कगार पर हैं. जागरुक होने के बाज सभ्य समाज में इन प्रथाओं को जारी रखना जनता के साथ बहुत बड़ा अन्याय माना गया और इसे धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया. आज हम आपको एक ऐसे ही रिवाज के बारे में बताने जा रहे हैं.. जिसका नाम- ‘मौताणा’ है.

इस प्रथा को मरने वाले के आश्रित को धन सहायता मुहैया कराने के लिए शुरू किया गया था. अप्राकृतिक, एक्सिडेंटल, असमय मृत्यु पर जिम्मेदारी शख्स को इस प्रथा के अनुसार मरने वाले के परिवार को पैसा देना होता था. पहले के जमाने मं राजस्थान के लोग बिखरे हुए थे और ये खेती-किसानी पर आश्रित नहीं थे. ऐसे में कई बार दो आदिवासी समूह एक-दूसरे पर हमला भी कर देते थे. इस मार-काट को खत्म करने के लिए ही मौताणा प्रथा को वजूद में लाया गया था. समूह के पंच बैठकर हत्या करने वाले पर मौताणा तय करते थे. दोनों पक्ष के एक मत पर आने तक रकम घटती बढ़ती रहती थी.

मौताणा तय होने तक लाश का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता था. जब आरोपी पक्ष मौताणा पर राजी नहीं होता था तो लाश को उसके घर के दरवाजे पर रख दिया जाता था. आखिरी में आरोपी पक्ष को मौताणा देना ही पड़ता था. ऐसा नहीं था कि सिर्फ हत्या के मामले में ही मौताणा वसूला जाता था. अगर कोई व्यक्ति काम करते हुए खेत में मर जाए तो खेत मालिक को मौताणा देना पड़ता था. वाहन पर लिफ्ट देने वाले शख्स का अगर एक्सीडेंट हो जाए और लिफ्ट मांगने वाला मर जाए तो वाहन मालिक को मौताणा देना पड़ता था. कई मामलों में मौताणा दिए बिना संबंधित व्यक्ति को बख्शा नहीं जाता था.

अगर कोई आरोपी शख्स मौताणा देने से इंकार करता था तो उसके खिलाफ चढ़ोतरा की कार्रवाई की जाती थी. चढ़ोतरा यानी आरोपी के घर पर भारी संख्या में लोग हथियारों से लैस होकर चढ़ाई कर देते थे. समय के साथ यह प्रथा धुंधली पड़ती चली गई है. लेकिन यदा-कदा मौताणा वसूलने के मामले सामने आते रहते हैं.

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