भावनानी के व्यंग्यात्मक भाव – मैं भी भ्रष्टाचार करने में उस्ताद हूं

लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार कानूनी लेखक चिंतक कवि एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
जनता सयानी है तो मैं
उनसे अधिक देढ़ सयाना हूं
 चकरे पे चकरे खिलाता हूं
मैं भी भ्रष्टाचार करने में उस्ताद हूं
जनता के जेब से पैसे निकालने में माहिर हूं
पहले काम है का बहाना बनाता हूं
बड़े साहब का नाम धौंस बीच में लाता हूं
मैं भी भ्रष्टाचार करने में उस्ताद हूं
ऊपर देने के नाम पर रेट खुलासा करता हूं
साहबों की धौंस बहुत बताता हूं
उनकी मिलीभगत के किस्से सुनाता हूं
मैं भी भ्रष्टाचार करने में उस्ताद हूं
फाइल साहब के पास है ऐसा बताता हूं
मैं तो छोटा आदमी हूं मज़बूरी बताता हूं
साहब के नाम पर लेकर खुद डकारता हूं
मैं भी भ्रष्टाचार करने में उस्ताद हूं
चकरे खिलाने का माइना धीरे से बताता हूं
जेब ढीली करो इशारा करता हूं
ऊपर हिस्सा देने की बात समझाता हूं
मैं भी भ्रष्टाचार करने में उस्ताद हूं
जिसने दे दिया उनका काम फटाफट करता हूं
जिसने नहीं दिया फाइल ऊपर अटकी बताता हूं
घूस दे दिया तो काम करता हूं
मैं भी भ्रष्टाचार करने में उस्ताद हूं

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