व्यंग्य : गुटखे की पीक में बसता है बनारस का अद्भुत ज्ञान….!

दुनिया भर के लोग ज्ञान लेनें हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड जाते है, राहुल गाँधी और अखिलेश यादव विदेशों से डिग्री लेते हैं, पर बनारस में अंगूठा छाप लोग चाय के टपरी, लस्सी के दुकानों अथवा घाट की सीढ़ियों पर बैठकर ‘ब्रह्मांड’ का ज्ञान मुफ्त में बाँट देते हैं। यहाँ हर दूसरा आदमी आपको राजनीति से लेकर मोक्ष तक की ऐसी ‘थ्योरी’ बता देगा कि मुलर और थार्नडाइक का नियम भी अपना माथा पकड़ लें। यहाँ ज्ञान मिलता नहीं गुटके के पीक (थूक ) से बरसता है , यहाँ ज्ञान ‘चाय के कुल्हड़ से रिसता है… एक बार बनारस के घाट पर फ्रांस के पियरे साहब मिल गए। पियरे साहब अंग्रेजी के विद्वान, और पेरिस के सबसे बड़े ‘परफ्यूम एक्सपर्ट’ थे। उनका मानना था कि दुनिया की सबसे अच्छी खुशबू ‘पेरिस के सड़को पर तैरती’ है और वो अपनी जेब में पेरिस ब्यूटी का परफेक्ट परफ्यूम लेकर घूमने आए थे बनारस।
उनका मिशन था— बनारस के घाटों से निकलने वाले अगरबत्ती के खुशबुओं का आंकलन। जैसे ही पियरे साहब गोदौलिया चौराहे पर पहुंचे, उनकी नाक का ‘सॉफ्टवेयर’ हिल गया। एक तरफ से ताज़ा गोबर की खुशबू दूसरी तरफ से कचौड़ी की हींग वाली खुशबू आ रही थी, और तीसरी तरफ से किसी नाली का ‘क्लासिक’ बनारसी गंध। कन्फूजिया गए पियरे साहब! झट से अपनी डायरी में लिखते हुए बडबड़ाए — पेरिस में खुशबू बोतल में होती है, बनारस में खुशबू हवा में झूलती है। नाक यहां के नालियों से युद्ध कर रही है। यहाँ ‘नाक’ का होना एक साहसिक काम है।
पियरे साहब को पियरका गमछा लपेटे दू  तीन ठो पियरका चचा टाईप के बनारसी लौक गए। अब पियरे साहब को का पता कि बनारस के हर चौराहे पर आपको कम से कम दो-तीन ‘अघोषित मुख्यमंत्री’ मिल जाएंगे जो पान चबाते हुए कभी ओपी राजभर को तो कभी अनुप्रिया पटेल को देश का पीएम बनवाते गुफ़्तगू में दिख जाए। कुछ ठिका से लौटे टीका लगाए राज्य की अर्थव्यवस्था पर ऐसी चर्चा करेंगे कि साक्षात ‘फाइनेंस मिनिस्टर’ भी आकर नोट्स बनाने लगें। यहाँ राजनीति चाय के कुल्हड़ में घोली जाती है।
खैर दोपहर हुई पियरे साहब एक ‘इत्र’ की पुरानी दुकान पर पहुँचे जो ठीक ठेके के बगल में थी । उन्होंने दुकानदार से कहा— निड ए बॉटल ऑफ़ रॉयल परफ्यूम! दुकानदार अंग्रेजी बुझ नही पाया और लड़के को भेज बगल वाले ठेके से रायल स्टेग का एक बॉटल पियरे साहब को थमा दिया। दुकानदार द्वारा दी गईं  बड़ी सी शीशी देख पियरे की आंख लहराई, और तभी झट से दो बूंद पियरे के हाथ पर रख दी दुकानदार नें  यह ‘बनारसी बुझक्कड़’ था। पियरे ने जैसे ही उसे सूंघा, वो अपनी सुध-बुध खो बैठे। उन्हें लगा जैसे वो सीधे धरती माँ की गोद में सो रहे हैं। उन्होंने नोट लिखा— “अद्भुत! फ्रांस की लैब में हम केमिकल मिलाते हैं, और ये बनारसी लोग ‘इत्र में फ्रूट जूस मिलाते है’ मेरी पूरी डिग्री बेकार है।
असली धमाका तब हुआ जब पियरे नें बोतल से दारू को इत्र समझ देह को तराबोर कर ‘बनारसी पान’ आज़माने की सोची। दुकानदार ने पान में गुलकंद, पिपरमेंट और चूना लगाकर उन्हें दिया। पियरे ने जैसे ही पान चबाया, उनके फेफड़ों तक ठंडी हवा का झोंका गया। वो खुशी से झूमने लगे। शाम को पियरे मणिकर्णिका घाट पर थे। वहाँ धुएं और जलती लकड़ियों की गंध थी। पियरे ने रुमाल नाक से हटाया। उन्होंने महसूस किया कि यहाँ की हवा में ‘वैराग्य’ की खुशबू है। उन्होंने अपनी डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा: “पेरिस में हम शरीर को खुशबूदार बनाते हैं ताकि लोग हमें पसंद करें, बनारस में रूह को खुशबूदार बनाया जाता है ताकि ईश्वर हमें पसंद करे।
यहाँ की सबसे बड़ी खुशबू ‘सत्य’ है। पियरे ने अपना कीमती फ्रांसीसी परफ्यूम गंगा में बहा दिया और दुकानदार से एक पनडब्बा खरीद लिया। अगले दिन पियरे साहब कुर्ते पर चंदन का लेप लगाए घाट पर बैठे थे और हर आने-जाने वाले को सूंघकर बता रहे थे— “भाई साहब! आपमें से कचौड़ी की खुशबू आ रही है, मोक्ष के करीब हैं। उधर पियरे की अंग्रेजी भी धरी की धरी रह गईं क्यूंकि बनारस में इंग्लिश का अपना अलग ही व्याकरण है। यहाँ  व्हाटस् अप ब्रो ?’ नहीं चलता, यहाँ सिर्फ एक शब्द काफी है— ‘का गुरु?’। इसमें सवाल भी है, प्यार भी है, और सामने वाले की पूरी कुंडली खंगालने की शक्ति भी।
हर हर महादेव।
पंकज सीबी मिश्रा / व्यंग्यकार,  पत्रकार, जौनपुर यूपी 

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