बिठूर के कुम्हार बना रहे नए दौर की मिट्टी की गुल्लकें

  • अब सिर्फ सिक्के नहीं, बचपन की यादें भी सहेजेगी गुल्लक
कानपुर। कभी दादी-नानी के दिए सिक्कों की रखवाली करने वाली मिट्टी की गुल्लक अब नए रंग और डिजाइन में लौट रही है। फर्क बस इतना है कि इस बार बिठूर के कुम्हारों के साथ आईआईटी कानपुर भी जुड़ गया है। जिला प्रशासन की पहल पर पारंपरिक माटीकला को आधुनिक डिजाइन, रंग तकनीक और बाजार से जोड़ते हुए मिट्टी की गुल्लकों को नए स्वरूप में तैयार किया जा रहा है।
हाल के दिनों में गुल्लक को लेकर कानपुर में हुई चर्चाओं के बाद जिला प्रशासन ने इसे केवल बचत का साधन नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और स्थानीय कला से जुड़े सामाजिक अभियान के रूप में आगे बढ़ाने की पहल शुरू की है। जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि गुल्लक केवल मिट्टी का पात्र नहीं होती, बल्कि यह बचपन, परिवार और बचत की संस्कृति से जुड़ा भावनात्मक प्रतीक है। कभी छोटे-छोटे उपहार और रुपये बच्चे बड़ी आत्मीयता से अपनी गुल्लक में सहेजकर रखते थे। वही आदत आगे चलकर आर्थिक अनुशासन और बचत की सीख देती थी।
डीएम ने कहा कि आज समाज में अनावश्यक खर्च बढ़ रहे हैं और बचत की आदत कमजोर होती जा रही है। ऐसे समय में बच्चों को बचत का संस्कार देने के लिए गुल्लक एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। इसी सोच के साथ प्रशासन इसे जनजागरूकता आधारित अभियान के रूप में विकसित कर रहा है।
मुख्य विकास अधिकारी अभिनव जे. जैन ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य केवल पारंपरिक गुल्लकों को पुनर्जीवित करना नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगरों को आधुनिक बाजार और तकनीक से जोड़ना भी है। उन्होंने कहा कि बिठूर की माटीकला को नई पहचान दिलाने के लिए डिजाइन, पैकेजिंग और मार्केटिंग पर विशेष रूप से काम किया जा रहा है।
आईआईटी कानपुर के रंजीत सिंह रोजी शिक्षा केन्द्र प्रोजेक्ट के तहत बिठूर के माटीकला कारीगरों को तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है। आईआईटी में परियोजना की कॉर्डिनेटर रीता सिंह ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य केवल एक उत्पाद विकसित करना नहीं, बल्कि पारंपरिक कला, स्थानीय कारीगरों और बच्चों के बीच भावनात्मक एवं सांस्कृतिक जुड़ाव स्थापित करना भी है। उन्होंने कहा कि यदि पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक डिजाइन और बाजार की जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जाए तो वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मजबूत पहचान बना सकते हैं।
प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर शिखा तिवारी ने बताया कि कारीगरों को आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वहीं सिरामिक डिजाइनर शैली संगल बच्चों की पसंद और आधुनिक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए गुल्लकों के नए डिजाइन तैयार कर रही हैं। उनके मार्गदर्शन में रंग संयोजन, फिनिशिंग तकनीक और आकर्षक प्रस्तुतीकरण पर भी काम किया जा रहा है।
बिठूर के कुम्हार राम रतन ने बताया कि पहले मिट्टी की गुल्लकों की मांग लगातार कम होती जा रही थी, लेकिन अब नए डिजाइन आने के बाद लोगों की रुचि फिर बढ़ने लगी है। उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए कार्टून, पशु-पक्षी और पारंपरिक आकृतियों वाली गुल्लकें तैयार की जा रही हैं। इससे कारीगरों को भी नई उम्मीद मिली है।
जिलाधिकारी ने बताया कि इन गुल्लकों को सरकारी कार्यक्रमों में स्मृति-चिह्न और उपहार के रूप में भी प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे एक ओर स्थानीय कारीगरों को रोजगार और नई पहचान मिलेगी, वहीं दूसरी ओर बिठूर की पारंपरिक माटीकला को भी नया बाजार प्राप्त होगा।

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