अडानी ने कुंभ में प्रतिदिन एक लाख लोगों को भोजन कराने का संकल्प किया और चार दिन के अंदर ही हिंडेनबर्ग स्वाहा हो गया। अखिलेश यादव रात्रि के प्रहर में कुंभ स्नान का दिव्य लाभ लेना चाह रहे थे क्युकी दिन में योगी बाबा उन्हे पहचान जाते ।महाराजा हरिश्चंद से लेकर भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध से लेकर आजतक एक लंबी परम्परा हमको देखने को मिलती जहां राज पाट को तृण समझ कर नदी के घाट पर दान तप हेतु जाया गया। उस राह पर चला गया जो वन, कष्ट, संघर्ष और बोध की तरफ जाती है। वास्तव में त्याग का अर्थ दरिद्रता नहीं है। आपके पास भोग के लिए सब कुछ होते हुए उनके प्रति अनासक्त रहना ही त्याग है। संन्यासी बनने के क्रम में तुलसी बाबा एक चौपाई में लिखते हैं कि, नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाई भए संन्यासी।। अर्थात जब सब खो गया फिर तो अपने आप वैराग्य जाग जाता है, असली वैराग्य वह है जो सब कुछ होने के बाद जागता है। ऐसे लोग जिनका पेशा केवल लेखन अथवा साहित्य ही है, वह यदि धीरे धीरे राइट से लेफ्ट की तरफ़ जाते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपना विचार त्याग चुके हैं, उसका यह भी अर्थ नहीं है कि वह नासमझ हो गए हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि उन्हें राइट से जिस व्यवसाय की उम्मीद थी, वह नहीं हो पा रहा है। इसलिए वह दूसरी दिशा में अपना व्यापारिक लाभ देखकर शिफ्ट हो रहे हैं। ऐसे लोगों को समझा समझाकर आप थक जायेंगे लेकिन वह नहीं मानेंगे, क्यूंकि आप सोए हुए को जगा सकते हैं, जो सोने का नाटक कर रहा है उसे आप नहीं जगा सकते। राकेश यादव अजमगढ़ियां का वाकया देख लीजिए कट्टर समाजवादी बनने के चक्कर में बेचारा घनचक्कर हुआ फिर रहा ।

