महाकुंभ : नारि मुई गृह संपति नासी, मूड़ मुड़ाई भए संन्यासी ..।

यह महाकुंभ काफी चर्चित रहने वाला है क्युकी इस बार इस महाकुंभ में अध्यात्म के साथ – साथ ग्लैमर और मसाले का तड़का भी लगने वाला है । हर्षा रिछारिया, लॉरेन जॉब्स , संत अभय सिंह, जैसे कई मुद्दे लोगो को कुंभ की ओर खीच रहे । इस महाकुंभ में कई साधक चर्चा का केंद्र बने हैं। एक आईआईटी बाबा भी इस महाकुंभ की ही देन है जो कुंभ में इंटरव्यू के दौरान सोशल मीडिया पर पैदा हुए इंट्रेस्ट से वायरल हुए है उधर एक मनका बेचने वाली पगलेट किस्म की तरुणी मोनालिसा भी खूब वहावहाई हवा हवाई रस मलाई खा रही  । इन सबने कुम्भ मेले को गंध मचा के रख दिया है। लैपटॉप बाबा,  कंप्यूटर बाबा,  मोबाइल बाबा और पेजर बाबा का अलग स्वेग है । इन सबने भीड़ का सारा मजमा अपनी ओर खींच रखा है।उधर दूसरी ओर किसी के मुंह में भी माइक घुसेड़ देने वाले यूट्यूबर्स, रीलबाज़ों और पत्रकारों को महाकुंभ में अच्छा ‘प्रसाद’ मिल रहा है । मस्त मलंग बाबाओं की ओर से जिस तरह इन्हें दुत्कारा-दौड़ाया जा रहा है वो देखना ‘परम आनंद’ देने वाला है । मेला खतम होने के बाद सब कपूर की तरह उड़ खतम हो जायेंगे बस रह जायेंगी मेरी लिखी ये आर्टिकल जो आपको यह सब याद दिलाती रहेगी । यही बात हर उस सामर्थ्यवान पर लागू होती है जो सब कुछ प्राप्त कर लेने के बाद उसे तज देने का अनासक्त भाव रखता है।

अडानी ने कुंभ में प्रतिदिन एक लाख लोगों को भोजन कराने का संकल्प किया और चार दिन के अंदर ही हिंडेनबर्ग स्वाहा हो गया। अखिलेश यादव रात्रि के प्रहर में कुंभ स्नान का दिव्य लाभ लेना चाह रहे थे क्युकी दिन में योगी बाबा उन्हे पहचान जाते ।महाराजा हरिश्चंद से लेकर भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध से लेकर आजतक  एक लंबी परम्परा हमको देखने को मिलती जहां राज पाट को तृण समझ कर नदी के घाट पर दान तप हेतु जाया गया।  उस राह पर चला गया जो वन, कष्ट, संघर्ष और बोध की तरफ जाती है। वास्तव में त्याग का अर्थ दरिद्रता नहीं है। आपके पास भोग के लिए सब कुछ होते हुए उनके प्रति अनासक्त रहना ही त्याग है।  संन्यासी बनने के क्रम में तुलसी बाबा एक चौपाई में लिखते हैं कि, नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाई भए संन्यासी।। अर्थात जब सब खो गया फिर तो अपने आप वैराग्य जाग जाता है, असली वैराग्य वह है जो सब कुछ होने के बाद जागता है। ऐसे लोग जिनका पेशा केवल लेखन अथवा साहित्य ही है, वह यदि धीरे धीरे राइट से लेफ्ट की तरफ़ जाते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपना विचार त्याग चुके हैं, उसका यह भी अर्थ नहीं है कि वह नासमझ हो गए हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि उन्हें राइट से जिस व्यवसाय की उम्मीद थी, वह नहीं हो पा रहा है। इसलिए वह दूसरी दिशा में अपना व्यापारिक लाभ देखकर शिफ्ट हो रहे हैं। ऐसे लोगों को समझा समझाकर आप थक जायेंगे लेकिन वह नहीं मानेंगे, क्यूंकि आप सोए हुए को जगा सकते हैं, जो सोने का नाटक कर रहा है उसे आप नहीं जगा सकते। राकेश यादव अजमगढ़ियां का वाकया देख लीजिए कट्टर समाजवादी बनने के चक्कर में बेचारा घनचक्कर हुआ फिर रहा ।

पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर 

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