भारत और अमेरिका दोनों ही व्यापार समझौता करना चाहते हैं लेकिन अमेरिका सोचता है कि वह एक शक्तिशाली देश है और वह अपनी शर्तों पर भारत को झुका लेगा तो यह सोचना कहीं ना कहीं गलत है। दोनों के मध्य वार्ता हो रही है लेकिन भारत ने साफ कह दिया है कि वह अपना कृषि क्षेत्र और डेयरी क्षेत्र को अमेरिका के लिए नहीं खोल पाएगा। क्योंकि भारत के किसानों की जीविका इससे जुड़ी हुई है और कृषि क्षेत्र का वर्तमान समय में जीडीपी में लगभग योगदान 17 से 18 प्रतिशत के आसपास है और इस क्षेत्र में कुल कार्यबल का 45 से 46 प्रतिशत कार्यरत है। इसी प्रकार डेयरी क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 4 से 5 प्रतिशत है तथा इस क्षेत्र में लगभग 8 करोड लोग कार्यरत हैं और यह क्षेत्र कृषि से जुड़ा हुआ है।
अमेरिका चाहता कि भारत उसके लिए कृषि तथा डेयरी क्षेत्र को खोल दे जिससे उसकी कंपनियां इस क्षेत्र में व्यापार कर सकें। लेकिन भारत खोलने से मना कर रहा है। अब समझते हैं कि भारत कृषि क्षेत्र और डेयरी क्षेत्र को अमेरिका के लिए क्यों नहीं खोलना चाहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका जेनेटिकली मोडिफाइड सोयाबीन और कपास तथा मक्का की खेती करता है जो कि भारतीय उपभोक्ता को नुकसान पहुंचा सकता है और सस्ते दामों पर भारत में डंप हो सकता है। इसके अलावा जो डेरी क्षेत्र के उत्पाद है वह अमेरिका में पशुओं को मांस खिला करके उनसे प्राप्त किया जाता है जो कि भारतीय परिवेश में उपयुक्त नहीं है। इसके अलावा अमेरिका भारत को समय-समय पर रूस से सस्ता तेल ना खरीदने की नसीहत देता रहता है और उसने यह भी कह रखा है कि क्योंकि भारत रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है सस्ते दाम पर इसलिए हम उस पर 25 प्रतिशत अधिक टैरिफ लग रहे हैं तथा भारत के साथ व्यापार समझौता नहीं हो रहा है।
इसलिए उसके ऊपर और 25 प्रतिशत अधिक टैरिफ लगा रहे हैं कुल मिलाकर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा रहे हैं भारत सरकार का मानना है कि भारत एक संप्रभु देश है और किस देश के साथ हमें व्यापार करना है हमें कोई दूसरा देश इस बात की सलाह दे नहीं दे सकता है। अगर देखा जाए तो एक तरह से अमेरिका वर्तमान समय में अपने ताकत के नशे में चूर है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उसने वेनेजुएला में जो किया कि वहां के राष्ट्रपति को राष्ट्रपति भवन से अपहृत करके अपने न्यूयॉर्क की कोर्ट में ले गया और वहां पर उन्हें नुमाइश कराया जा रहा है। यह किसी देश के लिए एक तरह से बड़ा अपमानजनक है। दूसरी और अमेरिका को लग रहा है कि वह विश्व का थानेदार है।
जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कुछ नियम और कायदे होते है। किंतु अमेरिका इन सभी नियम कायदों को सिर्फ अन्य देशों पर लागू करता है और स्वयं के ऊपर लागू नहीं करता है। भारत को इन सब परिस्थितियों से निपटने के लिए एक साफ संदेश देना होगा कि भारत अपने किसानों के हितों को और अपने देशवासियों हितों को जरूर ध्यान रखेगा। वह किसी भी दबाव के आगे नतमस्तक नहीं होगा भारत को क्योंकि अमेरिका के साथ व्यापार में टैरिफ लग रहा है इससे भारत का व्यापार कम हो सकता है इसके लिए अन्य देशों के साथ व्यापार को बढ़ाना होगा और जिसमें भारत ने अभी तक ओमान, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया के साथ में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट कर लिया है।
उसे अब नए देशों को तलाशना होगा। इसी कड़ी में भारत के विदेश मंत्री जयशंकर जी फ्रांस जर्मनी की यात्रा पर हैं और यूरोपियन यूनियन के जो बड़े लीडर हैं जिसमें उर्सला वान शामिल है। वह भी भारत की यात्रा पर आ रही हैं तो भारत को अपने कार्यों से यह संदेश देना होगा कि भारत किसी के साथ झुक करके कार्य नहीं करता है। वह बराबरी और सम्मान पर कार्य करता है। इसके लिए भारत के राजनीति नेतृत्व को लगातार प्रयास करना होगा।

बाल गोविन्द साहू – कानपुर
