कहने के लिए तो टिकटों की कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए रेलवे ने रिफंड नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब यात्रियों को टिकट कैंसिल कराने पर पहले की तरह पूरा पैसा वापस नहीं मिलेगा, बल्कि समय के हिसाब से रिफंड में कटौती की जाएगी। नए नियमों के अनुसार, अगर कोई यात्री ट्रेन के निर्धारित प्रस्थान समय से 8 घंटे पहले टिकट रद्द करता है, तो उसे किसी भी प्रकार का रिफंड नहीं मिलेगा। अर्थात अगर आपने टिकट ली और अचानक आपको प्रस्थान के दिन कोई आवश्यक काम या घर में आकशमिक दुर्घटना या घटना घटी तो आप टिकट कैंसिल कर अपने पैसे से हाथ धो बैठेंगे भले बाद में रेलवे उसी सीट के लिए तत्काल किसी से डेढ़ गुना ज्यादा क़ीमत लेकर उसे यात्रा करा दे।
कायदे से नियम तो यह होना चाहिए कि ज़ब हम उस सीट की क़ीमत दे दिए है तो गंतव्य तक उस सीट के लिए किसी से कोई पैसा ना लिया जाय। यही हाल बैंक का भी है जहां आपके अकॉउंट से हर महीने चोरी छुपे एसएमएस चार्ज, मेंटेनेंस चार्ज इत्यादि के नाम पर ( बिना आपके सहमति के ) कुछ पैसे या सौ से कम कुछ रूपये काट लिए जा रहे और आपको भनक तक नहीं लगती और सोचिये की यदि एक व्यक्ति के अकॉउंट से एक माह में 89 रूपये भी कटे और ऐसे एक लाख ( न्यूनतम ) अकॉउंट है तो 89 लाख रूपये एक लोकल बैंक हर महीने काट रही जो एक बड़ा अमाउंट है और सीधा यह आपकी जेब पर डाका है। इसके लिए अब ग्राहकों को सुप्रीम कोर्ट का रुख करना चाहिए।
इस पूरे मुद्दे पर ज़ब स्थानीय ग्राहकों से जनपद जौनपुर के पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पंकज सीबी मिश्रा ने बात किया तो बैंक में पैसा जमा करने लोगो ने कहा की अब वो पैसा बैंक में जमा ही नहीं करना चाहते क्यूंकि ये अनचाही कटौती, न्यूनतम बैलेंस का आदेश और अपने मेहनत का जमा पैसा ही निकालने के लिए कई – कई घंटे लाईन में लगना बेहद मुश्किल क़ाम हो रहा। इसपर अब ग्राहकों ने पैसा घर पर रखना शुरू कर दिया है। सवाल यह है कि क्या बैंकिंग एक सेवा है या आम आदमी की जेब खाली करने का जरिया? आखिर क्यों एक आम नागरिक को अपने ही पैसे तक पहुँचने के लिए इतनी रुकावटों और कटौतियों का सामना करना पड़ता है? अब वक्त आ गया है कि इस ‘बैंकिंग लूट’ के खिलाफ आवाज़ उठाई जाए और नियमों में पारदर्शिता लाई जाए। कनेक्टिविटी की तरह ही, अपने पैसे को सुरक्षित रखना और उसका हिसाब पाना भी एक बुनियादी अधिकार होना चाहिए।
आंकड़े के अनुसार विगत वित्तीय वर्षों में बैंको ने एसएमएस चार्ज और न्यूनतम बैलेंस के नाम पर गरीब की जेब से 19,000 करोड़ की लूट की। बैंक अब गरीबी पर टैक्स वसूल रहे हैं क्यूंकि ये अमीरों का पैसा छू तक नहीं सकते उल्टे उन्हें देते है। आज मैं आपके सामने एक ऐसी सच्चाई रख रहा हूँ जो हर उस गरीब के दिल को चीर देगी, जिसकी जेब से चुपचाप पैसा काटा जा रहा है, पिछले तीन वित्तीय वर्षों में बैंकों ने सिर्फ़ ‘न्यूनतम बैलेंस न रखने’ के नाम पर (सोशल मिडिया पर दावों के अनुसार 19,000 करोड़ रुपये वसूल लिए हैं ) हाँ, आपने सही सुना 19,000 करोड़ ! सरकारी बैंकों ने 8,000 करोड़, और निजी बैंकों ने 11,000 करोड़ की यह लूट मचाई है, ये पैसा अमीरों का नहीं, बड़े कारोबारियों का नहीं बल्कि उन गरीबों का है जो दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनकी रोज की कमाई 300-400 रुपये भी नहीं बच पाती, छोटे किसान हैं, जो फसल बर्बाद होने पर भी बैंक में थोड़ा-सा पैसा रखते हैं सुरक्षा के लिए, बुजुर्ग पेंशनभोगी हैं, जो दवा के लिए निकालते हैं तो चार्ज कट जाता है, गृहिणियाँ हैं, जो घर चलाने के लिए हर पैसा गिन-गिनकर रखती हैं।
उनका जुर्म, बस इतना कि उनके खाते में ‘न्यूनतम बैलेंस’ पूरा नहीं हुआ। 100 रुपये, 200 रुपये, 500 रुपये का फर्क और बैंक 100 से 600 रुपये तक का पेनल्टी चार्ज काट लेते हैं। एटीएम का एक्स्ट्रा यूज़,चार्ज कटता है यह भी एक स्कैम है। बैंक स्टेटमेंट चाहिए .? चार्ज ! खाता इनएक्टिव ? चार्ज ! ये सब छोटे-छोटे नामों में छिपी हुई लूट है, जो हर महीने गरीब की मेहनत की कमाई को चूसती जाती है। हम ‘फाइनेंशियल इन्क्लूजन’ की बात करते हैं, लेकिन क्या यह इन्क्लूजन है? नहीं, यह तो गरीबी पर टैक्स है। गरीब बैंक में पैसा इसलिए रखता है ताकि सुरक्षित रहे, चोरी न हो – लेकिन बैंक उसी सुरक्षा के नाम पर उसकी जेब काट रहे हैं। मैं सरकार से, और आरबीआई से माँग करता हूँ कि गरीबों के पैसे लौटाए जाए और सारे मिनिमम बैलेंस पेनल्टी चार्जेस तुरंत जीरो कर दीजिए । छोटे खातों से कोई भी हिडन चार्ज, फाइन प्रिंट वाली लूट बंद हो।
बैंक अब आम आदमी का खून न चूसें बल्कि उसकी रक्षा करें, उसकी मदद करें। यह आम आदमी की चीख है, न्याय की पुकार है। मेहनत आपकी, पैसा आपका और खाता भी आपका… फिर ‘सर्विसेज’ के नाम पर ये छिपी हुई लूट आखिर क्यों? याद है संसद में राघव चड्डा ने बैंकों की तानाशाही पर कैसे दहाड़ा था ? उन्होंने एक बुनियादी सवाल पूछा था- “खाता मेरा, पैसा मेरा तो बैंक बिना बताए हर कदम पर चार्जेस क्यों काट रहे हैं?” आज वही सवाल देश का हर मध्यमवर्गीय और गरीब नागरिक पूछ रहा है।
बात बहुत साफ़ है- अगर बैंक कोई विशेष सुविधा दे रहा है, तो उसका शुल्क समझ आता है। लेकिन अपना ही पैसा खाते में कम होने पर ‘जुर्माना’ भरना, अपने ही खाते की स्टेटमेंट माँगने पर पैसे देना और यहाँ तक कि हर बैंक के एसएमएस अलर्ट के लिए अपनी मेहनत की कमाई कटते देखना सरासर नाइंसाफी है। क्या यह विडंबना नहीं है कि जो बैंक बड़े-बड़े उद्योगपतियों के करोड़ों के लोन माफ कर देते हैं, वही बैंक एक गरीब के खाते से ‘मिनिमम बैलेंस’ न होने पर चंद रुपये वसूलने में जरा भी शर्म महसूस नहीं करते? अमीरों को इन छोटे-छोटे चार्जेस से शायद कोई फर्क न पड़ता हो, लेकिन उस व्यक्ति से पूछिए जिसकी महीने भर की बचत का एक हिस्सा इन ‘हिडन चार्जेस’ की भेंट चढ़ जाता है।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
