- बुढ़ापे की लाठी: कानपुर में डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे ने दिलाया बुजुर्गों को हक
जब औलाद ने छोड़ा साथ, तो कानून ने थामा हाथ! बुजुर्ग माता-पिता को एसडीएम कोर्ट से मिला न्याय
प्रेमनाथ उम्र 66 वर्ष पीड़ित बुजुर्ग पिता ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्होंने साल 2017 में अपने बड़े बेटे नितिन कुमार की शादी बड़े ही अरमानों के साथ की थी। लेकिन शादी के महज दो साल बाद ही बेटे का रंग बदल गया। बेटा नितिन शादी के दो साल बाद ही माता-पिता से अलग रहने लगा। अलग होने के बाद भी बेटे का विवाद खत्म नहीं हुआ। वह न सिर्फ अपने बुजुर्ग माता-पिता को प्रताड़ित करने लगा, बल्कि घर के खर्चों में भी किसी तरह का सहयोग करने से साफ मना कर दिया।
जब ‘कानून’ बना बुजुर्गों का सहारा
बुढ़ापे के इस पड़ाव पर जहां यह बुजुर्ग दंपति पूरी तरह टूट चुका था, तभी उन्हें न्याय की एक किरण दिखाई दी। कुछ महीने पहले उन्हें “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007” (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के बारे में जानकारी मिली। इस कानून की ताकत को जानकर पीड़ित माता-पिता ने बिना देर किए एसडीएम कोर्ट, कानपुर में न्याय की गुहार लगाते हुए वाद दाखिल कर दिया।
सुलह अधिकारी ने कराया न्याय का अहसास
एसडीएम कोर्ट से यह संवेदनशील मामला सुलह अधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे के पास पहुंचा। डॉक्टर धीरेंद्र कुमार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों (माता-पिता और बेटे) को कोर्ट में तलब किया। सुलह अधिकारी ने दोनों पक्षों की बातों को बेहद बारीकी और संवेदनशीलता से सुना। बुजुर्ग माता-पिता के साथ हो रहे अन्याय को देखते हुए कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और 60 दिनों के भीतर बेटे को घर से बेदखल करने का आदेश जारी कर दिया।
बेटे ने भी मानी हार
कानून के सख्त रुख और सुलह अधिकारी की समझाइश के बाद बेटे नितिन को भी अपनी गलती का अहसास हुआ (या कानून के आगे झुकना पड़ा)। उसने अदालत में लिखित समझौता स्वीकार करते हुए कहा कि— “हमें यह फैसला मंजूर है, हम इस घर में नहीं रहेंगे और घर के बाहर कहीं भी अपना आशियाना ढूंढ लेंगे।” कानपुर का यह मामला समाज के उन तमाम बुजुर्गों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो अपनी ही औलाद के अत्याचार को चुपचाप सहते रहते हैं। यह कहानी साबित करती है कि अगर औलाद अपनी जिम्मेदारी भूल जाए, तो देश का कानून बुजुर्गों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार खड़ा है।
मामला नंबर 2 सिद्धार्थनगर, बिनगवां (थाना सेन पश्चिम पारा) कानपुर।
एसडीएम कोर्ट में सुलह: माता-पिता को ₹2000 महीना देगा बेटा, पत्नी को साथ रखने पर छोड़ना होगा घर
मूलनारायण पाल उम्र 63 वर्ष एक बुजुर्ग पिता को आखिरकार एसडीएम कोर्ट और सुलह अधिकारी के प्रयासों से न्याय और मानसिक शांति मिल गई है। ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ के तहत दायर इस मामले में दोनों पक्षों के बीच एक अनोखा समझौता हुआ है।
20 साल से सब्जी बेचकर बनाया था आशियाना
पीड़ित पिता ने बताया कि वह पिछले 20 वर्षों से समाधि पुलिया पर सब्जी की दुकान लगाकर परिवार का जीवनयापन कर रहे हैं। करीब 12 साल पहले उन्होंने मेहनत की कमाई से सोसाइटी में 60 गज का एक प्लॉट खरीदा था, जिसमें वे अपने परिवार के साथ रहते हैं। 9 साल पहले उन्होंने अपने बेटे राम जी उम्र 35 वर्ष की शादी की थी। आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद से ही बेटा और बहू आए दिन उनके साथ लड़ाई-झगड़ा और मारपीट करने लगे। इतना ही नहीं, बेटा घर के खर्चों में भी कोई सहयोग नहीं करता था।
परेशान होकर खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
रोज-रोज के क्लेश से तंग आकर जब बुजुर्ग को कानूनी अधिकारों का पता चला, तो उन्होंने एसडीएम कोर्ट कानपुर में वाद दाखिल किया। बुजुर्ग ने अपने भरण-पोषण की मांग के साथ ही बेटे को अपनी संपत्ति से बेदखल करने की गुहार लगाई। उन्होंने कोर्ट को यह भी सूचित किया कि बहू कई बार बिना बताए घर से भाग चुकी है और वर्तमान में वह कहां है, इसकी भी जानकारी नहीं है।
सुलह अधिकारी की मध्यस्थता से हुआ अनूठा समझौता
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुलह अधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे ने दोनों पक्षों को कोर्ट में तलब किया। काफी समझाने-बुझाने के बाद दोनों पक्षों के बीच निम्नलिखित शर्तों पर लिखित समझौता हुआ: बेटा हर महीने अपने पिता के बैंक खाते में ₹2,000 की धनराशि भरण-पोषण के रूप में जमा कराएगा। इस शर्त के बाद पिता अपने बेटे को संपत्ति से बेदखल नहीं करेंगे। पिता ने साफ कहा कि बेटा और उसके दोनों बच्चे घर में रह सकते हैं, लेकिन वह बहू को इस घर में नहीं रहने देंगे। बेटे ने भी पिता की इस शर्त को स्वीकार कर लिया। बेटे ने कोर्ट में कहा कि वह अपने दोनों बच्चों के साथ पिता के घर में रहेगा और ₹2,000 प्रति माह देगा। यदि वह भविष्य में अपनी पत्नी को वापस लाता है, तो वह पिता का घर छोड़कर बाहर किराए के मकान में रहने चला जाएगा।
डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे, सुलह अधिकारी ने बीपीएस न्यूज़ को बताया
“माता-पिता का सम्मान और बुढ़ापे में उनकी देखभाल करना बच्चों का कानूनी व नैतिक कर्तव्य है। दोनों पक्षों को बैठाकर काउंसलिंग की गई, जिसके बाद परिवार को टूटने से बचाते हुए यह सर्वसम्मत समझौता कराया गया है।”
मामला नंबर – 3 एम आई जी बर्रा (थाना गुजैनी) कानपुर।
राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर: 14567 (टोल-फ्री) इस नंबर पर कॉल करके बुजुर्ग अपने अधिकारों, भरण-पोषण और सुरक्षा से जुड़ी कानूनी जानकारी व मदद पा सकते हैं।
‘बीपीएस न्यूज’ की अपील: अपने आस-पास के बुजुर्गों को इस अधिकार के प्रति जागरूक करें।
