“जब औलाद ने छोड़ा साथ, तो कानून ने थामा हाथ!”

  • ​बुढ़ापे की लाठी: कानपुर में डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे ने दिलाया बुजुर्गों को हक
बीपीएस न्यूज़​, विशेष कानूनी जागरूकता अभियान  
“बुढ़ापे की लाठी”—यह महज़ एक मुहावरा नहीं, बल्कि हर माता-पिता की वह उम्मीद है जो वे अपनी औलाद से पालते हैं। लेकिन आज के दौर में जब यह ‘लाठी’ कमजोर होने लगती है या साथ छोड़ देती है, तब ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ बुजुर्गों के लिए असली लाठी बनकर खड़ा होता है।
​हर माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी की कमाई, अपनी खुशियां और अपनी ताकत बच्चों को पालने में लगा देते हैं। वे सोचते हैं कि यही बच्चे उनके बुढ़ापे की लाठी बनेंगे। लेकिन आज समाज की हकीकत बदल रही है। ​संपत्ति हाथ में आते ही बच्चे माता-पिता को बोझ समझने लगते हैं। ​वक्त पर इलाज, दो वक्त की रोटी और सम्मान के लिए बुजुर्गों को तरसा दिया जाता है। ​कई बार तो उन्हें अपने ही घर से बेदखल कर दिया जाता है।
जब कानून बना “बुढ़ापे की असली लाठी”
​कानपुर में सुलह अधिकारी डॉक्टर धीरेंद्र कुमार दोहरे ने इस कानून के जरिए कई बेसहारा और प्रताड़ित बुजुर्गों को उनका हक दिलाकर इस शब्द को सच साबित किया है। ​सुलह अधिकारी ने इस कानून को सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे जमीन पर उतारा है। बच्चों को उनकी कानूनी जिम्मेदारी याद दिलाकर बुजुर्गों को उनके ही घर में वापस सम्मानजनक स्थान दिलाया। जिन बुजुर्गों के पास आय का साधन नहीं था, उन्हें बेटों की जेब से ‘मासिक गुजारा भत्ता’ दिलवाकर आत्मनिर्भर बनाया। जो बच्चे प्रॉपर्टी नाम करवाकर माता-पिता को भूल गए थे, उन्हें धारा 23 का डर दिखाकर सीधे समझौते की मेज पर लाए। सुलह अधिकारी के पास लगातार मामले आ रहे हैं, जिनमे से अधिकांश मामलों में उन्होंने सुलह कराकर निपटाया, उनमे से कुछ मामले इस तरह से हैं।
मामला नंबर – 1  यशोदा नगर, मछरिया, कानपुर। 

जब औलाद ने छोड़ा साथ, तो कानून ने थामा हाथ! बुजुर्ग माता-पिता को एसडीएम कोर्ट से मिला न्याय

प्रेमनाथ उम्र 66 वर्ष पीड़ित बुजुर्ग पिता ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उन्होंने साल 2017 में अपने बड़े बेटे नितिन कुमार की शादी बड़े ही अरमानों के साथ की थी। लेकिन शादी के महज दो साल बाद ही बेटे का रंग बदल गया। बेटा नितिन शादी के दो साल बाद ही माता-पिता से अलग रहने लगा। अलग होने के बाद भी बेटे का विवाद खत्म नहीं हुआ। वह न सिर्फ अपने बुजुर्ग माता-पिता को प्रताड़ित करने लगा, बल्कि घर के खर्चों में भी किसी तरह का सहयोग करने से साफ मना कर दिया।

​जब ‘कानून’ बना बुजुर्गों का सहारा

​बुढ़ापे के इस पड़ाव पर जहां यह बुजुर्ग दंपति पूरी तरह टूट चुका था, तभी उन्हें न्याय की एक किरण दिखाई दी। कुछ महीने पहले उन्हें “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007” (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के बारे में जानकारी मिली। ​इस कानून की ताकत को जानकर पीड़ित माता-पिता ने बिना देर किए एसडीएम कोर्ट, कानपुर में न्याय की गुहार लगाते हुए वाद दाखिल कर दिया।

​सुलह अधिकारी ने कराया न्याय का अहसास

​एसडीएम कोर्ट से यह संवेदनशील मामला सुलह अधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे के पास पहुंचा। डॉक्टर धीरेंद्र कुमार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों (माता-पिता और बेटे) को कोर्ट में तलब किया। सुलह अधिकारी ने दोनों पक्षों की बातों को बेहद बारीकी और संवेदनशीलता से सुना। बुजुर्ग माता-पिता के साथ हो रहे अन्याय को देखते हुए कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और 60 दिनों के भीतर बेटे को घर से बेदखल करने का आदेश जारी कर दिया।

बेटे ने भी मानी हार

कानून के सख्त रुख और सुलह अधिकारी की समझाइश के बाद बेटे नितिन को भी अपनी गलती का अहसास हुआ (या कानून के आगे झुकना पड़ा)। उसने अदालत में लिखित समझौता स्वीकार करते हुए कहा कि— “हमें यह फैसला मंजूर है, हम इस घर में नहीं रहेंगे और घर के बाहर कहीं भी अपना आशियाना ढूंढ लेंगे।” ​कानपुर का यह मामला समाज के उन तमाम बुजुर्गों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो अपनी ही औलाद के अत्याचार को चुपचाप सहते रहते हैं। यह कहानी साबित करती है कि अगर औलाद अपनी जिम्मेदारी भूल जाए, तो देश का कानून बुजुर्गों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार खड़ा है।

​मामला नंबर 2 सिद्धार्थनगर, बिनगवां (थाना सेन पश्चिम पारा) कानपुर। 

एसडीएम कोर्ट में सुलह: माता-पिता को ₹2000 महीना देगा बेटा, पत्नी को साथ रखने पर छोड़ना होगा घर

मूलनारायण पाल उम्र 63 वर्ष एक बुजुर्ग पिता को आखिरकार एसडीएम कोर्ट और सुलह अधिकारी के प्रयासों से न्याय और मानसिक शांति मिल गई है। ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ के तहत दायर इस मामले में दोनों पक्षों के बीच एक अनोखा समझौता हुआ है।

20 साल से सब्जी बेचकर बनाया था आशियाना

​पीड़ित पिता ने बताया कि वह पिछले 20 वर्षों से समाधि पुलिया पर सब्जी की दुकान लगाकर परिवार का जीवनयापन कर रहे हैं। करीब 12 साल पहले उन्होंने मेहनत की कमाई से सोसाइटी में 60 गज का एक प्लॉट खरीदा था, जिसमें वे अपने परिवार के साथ रहते हैं। 9 साल पहले उन्होंने अपने बेटे राम जी उम्र 35 वर्ष की शादी की थी। आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद से ही बेटा और बहू आए दिन उनके साथ लड़ाई-झगड़ा और मारपीट करने लगे। इतना ही नहीं, बेटा घर के खर्चों में भी कोई सहयोग नहीं करता था।

परेशान होकर खटखटाया कोर्ट का दरवाजा

​रोज-रोज के क्लेश से तंग आकर जब बुजुर्ग को कानूनी अधिकारों का पता चला, तो उन्होंने एसडीएम कोर्ट कानपुर में वाद दाखिल किया। बुजुर्ग ने अपने भरण-पोषण की मांग के साथ ही बेटे को अपनी संपत्ति से बेदखल करने की गुहार लगाई। उन्होंने कोर्ट को यह भी सूचित किया कि बहू कई बार बिना बताए घर से भाग चुकी है और वर्तमान में वह कहां है, इसकी भी जानकारी नहीं है।

सुलह अधिकारी की मध्यस्थता से हुआ अनूठा समझौता

​मामले की गंभीरता को देखते हुए सुलह अधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे ने दोनों पक्षों को कोर्ट में तलब किया। काफी समझाने-बुझाने के बाद दोनों पक्षों के बीच निम्नलिखित शर्तों पर लिखित समझौता हुआ: बेटा हर महीने अपने पिता के बैंक खाते में ₹2,000 की धनराशि भरण-पोषण के रूप में जमा कराएगा। इस शर्त के बाद पिता अपने बेटे को संपत्ति से बेदखल नहीं करेंगे। पिता ने साफ कहा कि बेटा और उसके दोनों बच्चे घर में रह सकते हैं, लेकिन वह बहू को इस घर में नहीं रहने देंगे। बेटे ने भी पिता की इस शर्त को स्वीकार कर लिया। बेटे ने कोर्ट में कहा कि वह अपने दोनों बच्चों के साथ पिता के घर में रहेगा और ₹2,000 प्रति माह देगा। यदि वह भविष्य में अपनी पत्नी को वापस लाता है, तो वह पिता का घर छोड़कर बाहर किराए के मकान में रहने चला जाएगा।

डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे, सुलह अधिकारी ने बीपीएस न्यूज़ को बताया  

“माता-पिता का सम्मान और बुढ़ापे में उनकी देखभाल करना बच्चों का कानूनी व नैतिक कर्तव्य है। दोनों पक्षों को बैठाकर काउंसलिंग की गई, जिसके बाद परिवार को टूटने से बचाते हुए यह सर्वसम्मत समझौता कराया गया है।”

मामला नंबर – 3 एम आई जी बर्रा (थाना गुजैनी) कानपुर।

बुजुर्ग माता-पिता को तंग करने वाले बेटे-बहू को कोर्ट की दोटूक: ‘या तो शांति से रहो, या मकान खाली करो’
एक मामला बर्रा थाना क्षेत्र के गुजैनी (एमआईजी) से सामने आया है, जहाँ आए दिन के घरेलू क्लेश से परेशान एक बुजुर्ग दंपति को आखिरकार एसडीएम कोर्ट से न्याय मिला। कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए बेटे-बहू को सुधरने या घर खाली करने की दोटूक चेतावनी दी है।
गुजैनी निवासी 66 वर्षीय रामकृष्ण ने बताया कि उनका बड़ा बेटा विजय वर्मा अपनी पत्नी के साथ आए दिन लड़ाई-झगड़ा करता रहता था। बेटे-बहू के इस रोज-रोज के विवाद से रामकृष्ण और उनकी पत्नी का जीना मुहाल हो गया था और वे भारी मानसिक तनाव में जी रहे थे। जब बुजुर्ग माता-पिता ने इस पर आपत्ति जताई और उन्हें टोकने का प्रयास किया, तो बेटे-बहू सुधरने के बजाय बुजुर्गों को ही मारपीट करने की धमकी देने लगे।
इस प्रताड़ना से तंग आकर रामकृष्ण ने अपने एक मित्र से सलाह ली। मित्र ने उन्हें ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ के बारे में जानकारी दी। इसके बाद बुजुर्ग पिता ने कानपुर एसडीएम कोर्ट में अपने ही बेटे और बहू के खिलाफ वाद दाखिल कर दिया।
मामले की सुनवाई करते हुए सुलह अधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे ने दोनों पक्षों को कोर्ट में तलब किया। बुजुर्ग माता-पिता की व्यथा सुनने के बाद उन्होंने बेटे-बहू को कड़ी फटकार लगाई और आदेश जारी किया।
 “पति-पत्नी दोनों लोग शांतिपूर्वक तरीके से पिता के घर में रहें। यदि भविष्य में दोबारा विवाद हुआ या बुजुर्गों को परेशान किया गया, तो उन्हें तत्काल मकान खाली करना होगा।”
कोर्ट की इस सख्त हिदायत के बाद आरोपी पुत्र विजय वर्मा के तेवर ढीले पड़ गए। उसने कोर्ट के सामने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माना कि उसके और उसकी पत्नी के आपसी झगड़ों के कारण माता-पिता हमेशा तनाव में रहते हैं। विजय ने लिखित आश्वासन देते हुए कहा कि वे भविष्य में कभी भी आपस में लड़ाई-झगड़ा नहीं करेंगे और न ही अपने माता-पिता को किसी भी तरह से परेशान करेंगे।
एसडीएम कोर्ट के इस फैसले से बुजुर्ग दंपति ने राहत की सांस ली है, वहीं यह मामला समाज के उन लोगों के लिए भी एक सबक है जो बुजुर्गों को बोझ समझकर प्रताड़ित करते हैं।
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत यदि कोई बुजुर्ग प्रताड़ित है या उसे उसका हक नहीं मिल रहा है, तो तुरंत मदद लें।

 राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर: 14567 (टोल-फ्री) ​इस नंबर पर कॉल करके बुजुर्ग अपने अधिकारों, भरण-पोषण और सुरक्षा से जुड़ी कानूनी जानकारी व मदद पा सकते हैं।

‘बीपीएस न्यूज’ की अपील: अपने आस-पास के बुजुर्गों को इस अधिकार के प्रति जागरूक करें।

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