चतुरंग

जब अपने ही शतरंज का
खेल-खेलने लगते हैं तो
पराया भी अपने लगने लगते है।
जब हमदर्द ही दर्द
देने लग पड़ते हैं तो
बेदर्द भी हमदर्द लगने लगते हैं।
जब फूल भी चुभने लगते हैं तो
दर्द भरे कांटे भी
अपने लगने लगते हैं।
जब बिना कसूर के भी लोगों
नासूर जैसे चुबने लगे तो
कसूर भी अपने लगने लगते हैं।
जब मिठास भरे लोग भी
कड़वाहट उगलने लगते हैं तो
कटु वाणी भी मधुर स्वर लगने लगती हैं।
डॉ.राजीव डोगरा – कांगड़ा हिमाचल प्रदेश

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