कुछ लिखने के विचार में अपने साथ तो पहली मुख्य समस्या विषय की है क्युकी विषय बहुधा है पर मुद्दा लिखें तो साहब खफा, तकलीफ लिखे तो सरकार खफा, शबासी लिखे तो विपक्ष खफा, आंकड़ा लिखे तो कलेक्टर सर खफा और अगर बेबाकी लिखे तो साथ वाले मुस्टंडे खफा, तो आखिर किस विषय पर और क्या लिखे ! सच पूछो तो जब भी किसी अच्छी कवर स्टोरी को पढ़ता हूं तो कुछ लिखने की इच्छा लहरें मारने लगती हैं, परंतु अपनी ही अनपढ़ता और कमजोर स्मृति सारे उत्साह पर पानी फेर देती है। फिर याद आता है वो मशहूर लाइन कि किस किस को देखिए, किस किस को रोइए, अभिनय बड़ी चीज है आंख ढक के सोइए । कई लेख, पोस्ट, न्यूज पढ़ डाली। मैं ठहरा एक आम इंसान, उसपर भी वह अनपढ़ आम इंसान, जो प्रत्येक पहलू को आम इंसान की तरह और उसकी भलाई के रूप में ही देखना और समझना चाहता है। परंतु आज मैं एक प्रबुद्ध लेखक के रूप में, अपने आप को स्थापित करने को प्रतिबद्ध, एक प्रबुद्ध लेखक की तरह ही विचारों के भंवर में उतर रहा । कभी – कभी राजनीतिक विश्लेषण का भाव लेखन इच्छा पर प्रभुत्व जमा लेता है और फिर मन केजरीवाल सा हो जाता है किंतु उसे अखिलेश यादव सा बना कर भाव योगी जी वाले डाल देता हूं। परंतु आज भीष्म प्रतिज्ञा थी कुछ लिखने की, इसलिए सोशल मीडिया में विषय चूज करने के लिए ट्रेंड न्यूज का सहारा लिया सामने आए अबू आजमी और उनका चापलूस औरंगजेब । अब ये औरंगजेब की नश्ले देश छोड़ने का नाम नहीं ले रही ऊपर से अबू आजमी जैसे लोग वोट की मलाई चाटने के लिए कुछ भी गर्दा उड़ा सकते है । सोशल मीडिया के ट्रेंड न्यूज में जेलेंस्की और ट्रंप की न्यूज कॉन्फ्रेंस भी छाई हुई मिली। उसमें कई ट्रंप निंदक, ट्रंप को बिगड़ैल और जेलेंस्की को एक मूर्ख बादशाह बताते, मोदी को यूक्रेन की तबाही का जिम्मेदार ठहराते और कई प्रशंसक उसमें शेर जैसा जिगर और 56 इंच के दर्शन करते । विचारों का भंवर समुद्र में उठे तूफान की तरह कभी यूक्रेन की आम जनता की मौतों, तबाह होती शिक्षा, चिकित्सा, व्यवस्था, जनजीवन, अर्थव्यवस्था को देख, सुन और पढ़कर भाटे की तरह बैठता चला जाए तो कभी जेलेंस्की की व्यक्तिगत उपलब्धि, देश की उसी तबाह होती जनता के हीरो, गॉड, 56 इंची सीने, शेर जैसे जिगर पर, ज्वार की लहरों की तरह उछालें मारने लगे। सो अब असमंजस में हूं कि लिखूं तो क्या लिखूं ? क्या यूक्रेन की आम जनजीवन की तबाही, वहां की तबाह होती अर्थव्यवस्था, जेलेंस्की के व्यक्तिगत “सत्ता और राजनीतिक वर्चस्व” के लिए देश को बर्बाद कर देने की हद तक जाने की व्यथा लिखूं या अखिलेश को उनके फर्जी सेक्यूलेरिज्म पर कोसूं, अबू आजमी को लानत भेजूं या ट्रंप को दो टूक जवाब देने की हिम्मत लिखूं ! 56 इंची सीने या शेर जैसे जिगर के लिए वाहवाही लिखूं या उसी तबाह होती जनता के हीरो रूस के लिए पैगाम लिखूं , भगवान बनने के लिए प्रशंसा में आईआईटीएन बाबा की जय जयकार लिखूं या गद्दारी में औरगंजेब चालीसा लिखूं ? मसखरे पप्पू पर वह पुरानी कहावत बिल्कुल सटीक लागू हो रही कि लौट के बुद्धू घर को आए । डीप स्टेट वालों ने उसे कमीज और हवाई चप्पल पहनाकर जितना ड्रामा और कॉमेडी करवाना था करा लिया। अकल का वह दुश्मन भी डॉलर के नशे में मुंह खोलकर लुंगी डांस करता रहा ! ट्रंप वाला अमेरिका वह सुपर पावर है, जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शक्तिशाली आधुनिक सेना को कमांड करता है । फिलहाल उससे बैर भाव रखना किसी भी मायने से उचित नहीं होगा। एक शक्तिशाली राजा के सामने एक कमजोर राजा कैसे काम करता है, उसे इतिहास की पन्नों से सीखना चाहिए, न कि किसी के बहकावे में आ कर और पिछलग्गू बनकर उसके साथ खुल्लम खुल्ला विवाद करना है। इस तरह की समस्या से निकलने के लिए कूटनीति की आवश्यकता होती है । यह उन लोगों के राजनीतिक ज्ञान पर भी तमाचा है जो बोल रहे थे 56 इंच का सीना तो ज़ेलेंस्की के पास है, अपने वाले के पास तो बिलकुल नहीं हैजब उसे होस आया और पता चला कि बाप की गद्दी पर जो बिडेन नहीं, ट्रंप बैठा है । डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूक्रेन को अमेरिकी सहायता रोक देने के बाद, अब ज़ेलेंस्की को डोनाल्ड ट्रम्प के साथ अपने विवाद पर पछतावा है । अब, उसका कहना है कि वह ट्रंप के साथ ‘चीजों को सही करना’ चाहता है। यूक्रेन में स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए उनके ‘मजबूत नेतृत्व’ के तहत काम करना चाहता है !! यूक्रेन बातचीत की मेज पर आने के लिए तैयार है. बेशर्मी से गिड़गिड़ाते हुए कहा है कि मैं और मेरी टीम डोनाल्ड ट्रंप के मजबूत नेतृत्व में काम करने के लिए तैयार हैं । मित्रों, अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की विचारधारा एक जैसी है. अमेरिकी शासन में घुसी बैठी सोच “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली मानसिकता, जो दूसरे देशों के खिलाफ इस तरह के कूटनीतिक कार्रवाई अंदरखाने करती है।

पंकज सीबी मिश्रा/राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
