अशांत संत के दोषारोपण से उपजी राजनीति……..!

अविमुकतेश्वरानन्द प्रकरण के बाद से अखिलेश यादव उत्साहित दिखे हैं ऊपर से भाजपा का यूजीसी नियम में  इक्विडिटी कमेटी पर चुप्पी, मोदी – शाह का  सवर्णो के लिए कोई योजना ना लाना, प्रदेश में ओबीसी अध्यक्ष लाना और एससीएसटी एक्ट क़ानून पर चुप्पी नें सपा और  कांग्रेस को सवर्णों के काफ़ी नजदीक पहुंचा दिया  है। याद होगा की कभी ब्राह्मणो के अकेले दम पर मायावती यूपी की सत्ता पर काबिज रही। अब देश और प्रदेश में बीजेपी द्वारा ब्राह्मणों की उपेक्षा नें मायावती को भी उत्साह से भर दिया है। अब जो दल सवर्णो  को आरक्षण और सुरक्षा देगी सवर्ण उसके साथ हो लेंगे। अखिलेश को लग रहा है कि शंकराचार्य मुद्दे पर अविमुक्तेश्वरानंद का साथ देकर उन्होंने बाजी मार ली है , चुनाव में हिन्दू अब उन्हें ही वोट देंगे। मुस्लिम वोट पहले ही उनकी पॉकेट में हैं तो समझो अगले चुनाव में बल्ले बल्ले ? वैसे कमाल की बात है न ? स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और अविक्तेश्वरानंद के संबंध सीधे कांग्रेस से हैं, अखिलेश से तो है भी नहीं। होते तो 2015 में मुख्यमंत्री अखिलेश काशी में अविमुक्तेश्वरानंद पर लट्ठ न बरसवाते ?
लेकिन न जाने क्यों कांग्रेस इस मसले पर चुप क्यों है ? सोनिया , राहुल , प्रियंका तीनों चुप हैं , जबकि पवन खेड़ा ही अकेले थोड़ी बहुत उछल कूद कर रहे हैं। वैसे अखिलेश यादव को बता दें कि यूपी में चुनाव हाल फिलहाल नहीं होने वाले, 2027 में होंगे । एक साल में राजनैतिक मुद्दों की हवा निकल जाती है। साल भी क्या दस पांच दिन बाद स्नान का यह प्रसंग लोग भूल जाएंगे। चुनावी फायदा लेना है तो सवर्णों को पुख्ता कीजिए , स्नान को लेकर किए जा रहे तमाशे का कोई लाभ नहीं मिलेगा । सामने देखिए ! योगी महाराज लव जिहाद पर बात कर रहे हैं । यह मुद्दा लोगों पर असर डालता है। वही सफल व्यक्ति  है इस ज़माने में जो जातिगत राजनीति में वर्जस्व की ओर देखे। हम तो समझ रहे थे कि अविमुक्तेश्वरानंद  इधर के शंकराचार्य हैं लेकिन जब कुख्यात मुख्तार अंसारी पर  कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप लगा उसी मुख़्तार के  भाई अफजाल अंसारी आज इन शंकराचार्य  का बखान कर रहा है तो आप समझ जाइए की क्या खिचड़ी पक रही है। 2015 में अखिलेश यादव की सरकार ने जब इनको लाठी लाठी कूट दिया था इनको तोड़ दिया था इनके शरीर को जगह-जगह से सुजा दिया इतना ही नहीं इनके ऊपर 6 गंभीर केस में मुकदमा भी दर्ज करवा दिया था जिसे बाद में योगी सरकार ने 2023 में वापस लिया था।
अखिलेश यादव ने मान लिया है कि यूपी में कांग्रेस उनके किसी काम आने वाली नहीं है । यह बात ममता बनर्जी बंगाल में चार साल पहले मान चुकी है । यही वजह है कि अखिलेश अब यूपी में ओवैसी के साथ हाथ मिलाने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि चालाक ओवैसी एक साल पहले अपने पत्ते नहीं खोलेंगे । बेशक बंगाल में उन्होंने खुद को डुप्लीकेट बाबरी मस्जिद से जोड़ते हुए हुमायूँ कबीर के साथ जाने का मन बनाया है । बंगाल में चुनाव तीन महीने बाद हैं , अतः ओवैसी शीघ्र कोई फैसला ले लेंगे। जो लोग ओवैसी की पॉलिटिक्स से परिचित हैं वे जानते हैं कि ओवैसी का उद्देश्य मुस्लिमों में पैठ बनाना है , राज्यों की स्थापित पार्टियों को चोट पहुंचना हैं । यही वजह है कि विपक्षी नेता एआईएमआईएम को बीजेपी की बी टीम कहते नहीं अघाते ।
क्षमा कीजिए आज वैसे भी हिंदू समाज में शंकराचार्य की स्थिति इस तरह हो गई है जिस तरह अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर की थी जिसकी हुकूमत सिर्फ लाल किले तक सीमित थी इसका कारण है आदि शंकराचार्य हिंदू मान्यताओं को लोगों तक प्रसारित करने के लिए पैदल चला करते थे और जो रास्ते में मिल जाता था वह खा लिया करते थे परंतु वर्तमान शंकराचार्य का घमंड देखिए इन्हें पैदल चलना अपना अपमान महसूस होता है और आम लोगों के बीच में कभी सनातन के प्रचार प्रसार के लिए यह लोग जाते नहीं हैं इन लोगों के मुकाबले कई महंत और संगठन तथा अखाड़े हिंदू समाज में ऐसे हैं जिनकी बड़ी जबरदस्त पकड़ है और जिनके प्रवचन में बहुत बड़ी संख्या में लोग सुनने के लिए आते हैं और दूसरी तरफ शंकराचार्य के प्रवचन को सुनने के लिए उतने लोग भी नहीं आते जितने मुसलमान के मजारों पर लगने वाले मेलों में लोग जाते हैं? क्योंकि शंकराचार्य आम लोगों से कट चुके हैं इसलिए इनका राजनीतिक प्रभाव कुछ नहीं है और हिंदू समाज के लोग इनके कहने पर कहीं पर भी वोट नहीं डालते हैं ?
याद कीजिए इंदिरा गांधी के समय गौ रक्षा आंदोलन करपात्री जी महाराज द्वारा किया गया था जिसका बहुत बड़ा उसे समय चर्चा हुई थी उसके अलावा शंकराचार्य द्वारा भारतीय मूल्यों को लेकर कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया गया जिससे लोग उनके साथ जुड़ सकें यही कारण है कि आज शंकराचार्य आम जनता के बीच में कोई विशेष महत्व नहीं रखते हैं जहां तक राजनीतिक लोगों का सवाल है उन्हें तो हिजड़े के पांव छूने में वोट के समय कोई फर्क नहीं पड़ता परंतु आज हिंदू समाज द्वारा जितने भी बड़ी समस्याएं हैं उनके बारे में शंकराचार्य शून्य है। तो ममता की बात और है अखिलेश यादव , इस बार वे काफी उलझ गई हैं । लेकिन  यूपी में एक बात समझ लीजिए। अगले साल चुनाव चूंकि उत्तराखंड में भी हैं। वहां टू पार्टी सिस्टम है अतः ओवैसी की ज्यादा जमेगी नहीं। पर यूपी में सपा, भाजपा, कांग्रेस, बसपा, लोकदल और अनेक क्षेत्रीय दल मौजूद हैं। अतएव ओवैसी एकला चलेंगे तो खूब मजे में रहेंगे। तो अखिलेश यादव याद रखिए  बीजेपी विरोध के लिए अविमुक्तेश्वरानंद ब्रांड काम नहीं आएगा आप  सवर्णो का मुद्दा ढूंढ लीजिए, प्रयागराज के अंगूर खट्टे हैं। राजनीति सही दिशा में हो तो जायज है वरना उलझें रहीए  आत्ममुग्धता में।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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