- धर्म और परंपराओं को लगातर निभाती एवं राम राज्य का वास्तविक अर्थ समझाती रामलीला का होता है भव्य मंचन
- शहर ही नही आस-पास के क्षेत्रों के निवासियों की मुख्य आस्था का केंद्र रही परेड की राम लीला
- प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता व हनुमान सहित अन्य देवी-देवताओं की निकलने वाली झांकी यात्रा रहती है मुख्य आकर्षण का केंद्र
कानपुर। जिस प्रकार से एक परिवार की परम्पराएं होती है जिन्हे वर्तमान पीढी अपने आने वाली पीढियों को देती है व उनके लिए सहेजती है और यह क्रम भारत के सभी परिवारों में लगातार चलता आ रहा है, लेकिन भगवान राम की लीलाओं और उनके संदेशों को लगातार सहेजती और नयी पीढियों को धर्म व आस्था की राह दिखाने वाली कानपुर के परेड मैदान की रामलीला इस बार अपने 150वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है।
आजादी से पहले अंग्रेजो के जमाने में कानपुर की यह रामलीला का प्रथम बार मंचन किया गया था, जिसमें हटिया में राजगददी हुई और वहीं से रामलीला की शुरूआत हुई थी। समय बीतने के साथ रामलीला का स्वरूप भी भव्य होता गया और लीला परेड के मैदान में होने लगी। महत्वता इतनी की बडी संख्या में लोग यहां रामलीला और रावण वध देखने के लिए एकत्र होने लगे और यहीं से यह परम्परा शुरू हो गयी।
श्री रामलीला सोसाइटी के पदाधिकारियों के सार्थक प्रयासो और समाज में सनातियों की कडियों के जोडने का कार्य को सर्वोपरी रखते हुए रामलीला के भव्य स्वरूप का मंचन किया जाने लगा और हर वर्ष यह जारी है। जब पहली बार रामलीला का मंचन किया गया था तो अंग्रेज अधिकारी भी शामिल थे और आजादी से पूर्व तक यह क्रम जारी रहा। और कानपुर सहित आसपास के क्षेत्रों में ही नही अपितु पूरे प्रदेश में कानपुर की इस रामलीला ने अपनी पहचान बनायी है। राज भले ही अंग्रेजी सरकार का रहा हो लेकिन भगवान राम की आरती अंग्रेजी कोतवाल ही उतारते थे।
रावण वध के उपरान्त भगवान राम और लक्ष्मण का रथ शहर की कोतवाली जाता था, जहां अंग्रेज कोतवाली प्रभु राम की आरती उतारते थे। यहीं परम्परा आज भी कायम है। यह रामलीला मात्र मंचन ही बल्कि भारतीय सनातनी परम्परा, धर्म और विश्वास का अटूट रिश्ता है। सासाइटी के संयोजन जगत नरायण गुप्ता बताते है कि आज रामलीला मंचन अपने 150वें वर्ष में है और शहरवासियों के लिए भगवान राम की लीला के लिए सोसाइटी के सभी पदाधिकारी पूर्ण श्रद्धा के साथ अर्पित रहते है। उन्होने बताया कि रावण वध के बाद कलक्टर गंज में भरत मिलाप होता है और इसी के साथ इस परम्परा का समापन होता है।
जगत नरायण गुप्ता ने बताया कि प्रतिदिन श्रीराम प्रभु, लक्ष्मण, माता जानकी के साथ अन्य भगवानों की भव्य आरती निकाली जाती है। यह आरती मेस्टन रोड स्थित रामगोला से निकली है जो विभिन्न मार्गो से होती हुई रामलीला मैदान पहुंची है। मेले में हर धर्म-जाति के लोग पहुंचते है और भारत की एकता और अखंडता के साथ अपनी परम्पराओं को मिलकर साझा करते है। उन्होने कहा कि हम सभी पदाधिकारी इसी प्रकार प्रभु राम के कार्य में लिप्त रहेंगे और इस रामलीला में हर वर्ष नए आकर्षण के साथ इसे और भी सुंदर और सुव्यवस्थित बनाने का प्रयास करते रहेंगे।
