बीपीएस न्यूज़ की बुजुर्गों के अधिकारों पर विशेष सामाजिक जागरूकता मुहीम (भाग- 2)
प्रिय पाठकों, आज की आधुनिक और भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर उन हाथों को भूल जाते हैं, जिन्होंने हमें चलना सिखाया। समाज में बुजुर्गों के साथ बढ़ती उपेक्षा और अकेलेपन को देखते हुए ‘बीपीएस न्यूज़’ एक नई मुहिम चला रहा है। भारत सरकार द्वारा बनाए गए ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ की संपूर्ण जानकारी हम हर हफ्ते किस्तों में आप तक पहुँचाएंगे। हमारा उद्देश्य केवल कानून बताना नहीं, बल्कि हर बुजुर्ग को उसका हक और हर नागरिक को उसका कर्तव्य याद दिलाना है। आइए, इस मुहिम से जुड़ें और जागरूक बनें।
अंक 2: भरण-पोषण की मांग कौन और किससे कर सकता है?
अधिकार की बात: बच्चों की कानूनी जिम्मेदारी और बुजुर्गों का हक
पिछले अंक में हमने जाना कि यह कानून क्या है। आज हम जानेंगे कि इस अधिनियम के तहत कौन भरण-पोषण (खर्चा) पाने का हकदार है और किसे यह खर्चा देना होगा।
कौन दावा कर सकता है?
कोई भी माता-पिता या वरिष्ठ नागरिक जो अपनी संपत्ति या अपनी कमाई से अपना गुजारा करने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
खर्चा देने के लिए कानूनी रूप से कौन बाध्य है?
बच्चे: इसमें वयस्क बेटे, बेटियां, पोते और पोतियां शामिल हैं (नाबालिग बच्चे इसमें शामिल नहीं हैं)।
रिश्तेदार: यदि किसी वरिष्ठ नागरिक के कोई बच्चे नहीं हैं, तो वह ऐसे किसी भी वयस्क कानूनी वारिस या रिश्तेदार से भरण-पोषण मांग सकता है, जिसे भविष्य में उस बुजुर्ग की संपत्ति विरासत में मिलने वाली है।
याद रखें: यदि बच्चे या रिश्तेदार सक्षम होने के बावजूद बुजुर्गों की अनदेखी करते हैं, तो यह कानूनन अपराध है।
बीपीएस न्यूज़ – सच्ची कहानी
एसडीएम कोर्ट में सुलह, बेटे-बहू ने मांगी माफी, ‘एसडीएम कोर्ट का आदेश बना बुजुर्गों की ढाल’
कानपुर। कहा जाता है कि बुढ़ापे में औलाद माता-पिता की लाठी बनती है, लेकिन जब वही लाठी बुजुर्गों पर बरसने लगे तो कानून ही उनका एकमात्र सहारा बनता है। ऐसा ही एक झकझोर देने वाला और बाद में राहत देने वाला मामला काकादेव थाना क्षेत्र के अंतर्गत सामने आया है। जहाँ एक 66 वर्षीय बुजुर्ग और उनकी पत्नी, जो कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं और चलने-फिरने में भी लाचार हैं, अपने ही सगे बेटे और बहू के अत्याचारों का शिकार हो रहे थे।
बुजुर्ग दंपत्ति का आरोप था कि उनका पुत्र नशे का आदी है और बहू के साथ मिलकर लगातार मकान को अपने नाम कराने का दबाव बना रहा था। मना करने पर न सिर्फ सार्वजनिक रूप से उन्हें अपमानित किया जाता था, बल्कि मारपीट कर जबरन घर से निकालने की धमकियाँ भी दी जा रही थीं। आए दिन होने वाली इस गाली-गलौज और हिंसा के कारण बुजुर्ग दंपत्ति अपने ही घर में जान-माल के खतरे के साए में जीने को मजबूर थे।
जब बुजुर्ग ने उठाया कानूनी कदम
अत्याचार की पराकाष्ठा होने पर बुजुर्ग ने हिम्मत दिखाई और अपने बेटे-बहू को मकान से बेदखल करने के लिए एसडीएम कोर्ट (भरण-पोषण ट्रिब्यूनल) में एक वाद दाखिल किया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने इसे सुलह अधिकारी के सुपुर्द किया।
सुलह अधिकारी की सूझबूझ से बिखरने से बचा परिवार
इस वाद की सुनवाई सुलह अधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे द्वारा की गई। उन्होंने दोनों पक्षों को बराबर तारीखों पर बुलाकर बेहद धैर्यपूर्वक सुना। सुलह अधिकारी के अथक प्रयासों और काउंसिलिंग का असर यह हुआ कि बेटे और बहू को अपनी गलती का अहसास हो गया। पुत्र ने अदालत के सामने माता-पिता से अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी और भविष्य में कभी परेशान न करने का वचन दिया।
समझौते (सुलहनामा) की मुख्य शर्तें
सुलह अधिकारी की देखरेख में दोनों पक्षों के बीच एक लिखित समझौता तैयार हुआ, जिसकी मुख्य शर्तें इस प्रकार हैं:
सम्मान और देखरेख: विपक्षी (बेटा-बहू) वादी (माता-पिता) का पूरा ध्यान रखेंगे, बीमारी में उचित इलाज कराएंगे और उनका पूरा सम्मान करेंगे।
मकान पर कोई अवैध कब्जा नहीं: पुत्र ने स्पष्ट किया कि उनका मकान पर कब्जा करने का कोई इरादा नहीं है और वे पूर्व की भांति केवल रहने के लिए मकान में रहेंगे।
भविष्य की सुरक्षा: हालांकि आवेदक बुजुर्ग को अपने बच्चों से कोई भरण-पोषण (पैसा) नहीं चाहिए, लेकिन यदि भविष्य में समझौते की किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो विपक्षियों के खिलाफ तत्काल कड़ी विधिक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
बुजुर्ग बोले— “कानून ने दी नई जिंदगी, हमारे बीच की गलतफहमियां हुईं दूर”
सफलतापूर्वक हुए इस समझौते के बाद बुजुर्ग भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि उन्होंने यह 95 गज का मकान सोसाइटी के क्षेत्र से लिया था। उन्होंने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ की सराहना करते हुए कहा—
“यह कानून हम जैसे असहाय बुजुर्गों के लिए एक वरदान है। सुलह अधिकारी डॉ. धीरेंद्र कुमार दोहरे के प्रयासों से हमारे और बच्चों के बीच की गलतफहमियां दूर हो गईं और एक संतोषजनक सुलह हो सकी। हमें एसडीएम कोर्ट से इस आदेश की प्रमाणित कॉपी भी मिल गई है, जो भविष्य में हमारी सुरक्षा की गारंटी बनेगी।”
पुत्र ने भी अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि कुछ गलतफहमियों के कारण विवाद हुआ था, जिसे अब सुलझा लिया गया है और वे अपने माता-पिता की सेवा के लिए पूरी तरह समर्पित हैं।
बीपीएस न्यूज़ की सीख:
यह मामला समाज के उन तमाम बुजुर्गों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो अपने ही बच्चों के अत्याचारों को भाग्य की लकीर मानकर चुपचाप सहते रहते हैं। ‘वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007’ न सिर्फ बुजुर्गों को त्वरित न्याय दिलाता है, बल्कि बिखरते हुए परिवारों को फिर से जोड़ने का काम भी करता है। जरूरत सिर्फ सही समय पर सही मंच तक आवाज पहुँचाने की है।
अगले हफ्ते (अंक- 3) ज़रूर पढ़ें:
शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज करें? साथ ही अगली नई सच्ची कहानी के साथ जानिए अगले हफ्ते केवल बीपीएस न्यूज़ पर।”
मदद के लिए यहाँ संपर्क करें: राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन (Elderline): 14567 (टोल-फ्री नंबर)
नज़दीकी सहायता: अपने क्षेत्र के उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) कार्यालय या स्थानीय पुलिस स्टेशन से संपर्क करें।
