तू ना सम्हाले तो हमें कौन सम्हाले..!

एक दावे के अनुसार नीति आयोग की रिपोर्टकी रिपोर्ट कहती है कि पिछले एक दशक में भारत में 94,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जिससे बच्चों के नामांकन में 2.26 करोड़ की कमी आई है। सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख हो गई है। ये आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं और ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा के सामने खड़े कई बड़े संकटों को उजागर करते हैं। प्राथमिक स्कूलों में भरे लाखों फर्जी शिक्षक अब भी शासन के पकड़ से दूर है जबकि नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक देश में सरकारी स्कूलों की संख्या साल 2014-15 में 11.07 लाख थी, जो साल 2024-25 में घटकर 10.13 लाख रह गई।  इसी दौरान, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या भी 83,000 से घटकर 79,000 पर आ गई। प्राइमरी क्लास (पहली से पांचवीं) में स्कूल छोड़ने की दर जहाँ 0.3% है।
वहीं अपर प्राइमरी (छठी से आठवीं) में यह बढ़कर 3.5% हो जाती है। माध्यमिक स्तर (9वीं और 10वीं) तक पहुंचते-पहुंचते यह 11.5% के खतरनाक स्तर पर पहुंच जाती है। इसके अलावा, आठवीं से नौवीं कक्षा में जाने वाले छात्रों की दर भी साल 2014-15 के 91.58% से घटकर साल 2024-25 में 86.6% रह गई है। रिपोर्ट ने माध्यमिक स्तर पर बच्चों की पढ़ाई के स्तर (लर्न‍िंंग गैप्स) पर भी सवाल उठाए हैं। जांच में पाया गया कि कक्षा 9वीं के कई छात्र न केवल बीजगणित और ज्यामिति जैसे कठिन विषयों से जूझ रहे हैं, बल्कि उन्हें प्रतिशत, भिन्न और अनुपात  जैसी बुनियादी अवधारणाओं को समझने में भी दिक्कत आ रही है क्यूंकि हम जैसे योग्य युवा बेरोजगार स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे, ठेला लगा रहे और फर्जी शिक्षक सरकारी स्कूलों में मौज मार रहे। सोशल मीडिया पर अब इसे  लेकर ट्रोलिंग खूब बढ़ा है और इसके पीछे किन लोगों का समर्थन रहा है, यह जनता जानती है। वैसे अगर संरचनात्मक गड़बड़ियों पर सरकार से ही जवाब मांगा जाएगा, इस पर सरकार के लोग चिढ़ते क्यों हैं, यह समझ से परे है।
हाल ही में एक वाक़या उत्तरप्रदेश से सामने आया है, जब पत्रकार ने मंत्री दिनेश प्रताप सिंह से सवाल किया कि मुख्यमंत्री के उद्घाटन से पहले ही  लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे कई जगह से धंस गया है। तो दिनेश प्रताप सिंह ने जवाब दिया कि इसमें कौन सी नयी बात है, आप सड़क ख़ुद बनवा लो। उन्होंने सड़कों की टूट-फूट और मरम्मत को प्रक्रिया का हिस्सा बताया। बेशक सड़कें टूटती हैं, उनमें गड्ढे बनते हैं, लेकिन जब वे कई बरसों तक इस्तेमाल हो जाएं तब उनकी मरम्मत की नौबत आनी चाहिए। अगर उद्घाटन से पहले या शुरु होने के चंद दिनों में सड़कें, पुल या कोई भी इमारत टूटे तो ज़ाहिर है कि उसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। इस समय अकेले महाराष्ट्र या उत्तरप्रदेश से नहीं, बल्कि गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली कई राज्यों में कहीं सड़कें टूटीं, कहीं एयरपोर्ट पानी-पानी हुआ, कहीं स्टेशन पर पंखे से पानी गिरने लगा। ऐसी तस्वीरें देखकर समझा जा सकता है कि विकास के नाम पर जनता के दिए टैक्स से जो भारी-भरकम परियोजनाएं बन रही हैं, उनकी लागत का बड़ा हिस्सा भाजपा नेताओं, अधिकारियों या ठेकेदारों की जेब में जा रहा है। दिक्कत यह है कि भारतीय जनता ने इस भ्रष्टाचार को अब सामान्य आचरण मानकर स्वीकार कर लिया है। फिर भी कभी सवाल उठाए जाते हैं तो ऐसे ही जवाब मिलते हैं कि ‘खुद बनवा लो या जिनको कुत्ता नहीं पूछता वो सवाल पूछ रहे हैं।’
अब तो सरकार की आलोचना को व्यक्तिगत आलोचना माना जाने लगा है । जबकि हाल ही में महाराष्ट्र में ही जस्टिस माधव जामदार ने सरकार विरोधी नारे लगाने पर एक व्यक्ति को तड़ीपार करने के आदेश पर पुलिस को फटकार लगाई और साफ़ कहा कि किसी नेता के ख़िलाफ़ नारे लगाना देशविरोधी काम नहीं है। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा ही फैसला सुनाया था कि सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं है। लचर और दोषपूर्ण  शिक्षा व्यवस्था में सरकार के खिलाफ नारे आम बात है और जिन बच्चों ने दोबारा परीक्षा देने के तनाव से या पेपर लीक होने के अवसाद में अपनी जान दे दी, उनके साथ इंसाफ़ किस तरह होगा, यह एक बड़ा सवाल है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कम से कम 19 बच्चे अपनी जान दे चुके हैं और यह संख्या यहीं रुक जाए – ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।
बच्चों में प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही कुंठा भरनी शुरु हो जाती है। हर महीने लिए जाने वाले क्लास टेस्ट से लेकर छमाही और वार्षिक इम्तिहानों तक बच्चों पर दबाव बनाया जाता है कि अच्छे अंक लाना और प्रथम आना ही कामयाबी का एकमात्र रास्ता है, उसके अलावा जीवन में कुछ और बचा ही नहीं है। इस भावना के साथ पढ़ाई करने वाले बच्चों का मन हताशा की तरफ बढऩे लगता है और यही हताशा बोर्ड परीक्षाओं या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने पर जीवन ख़त्म करने के विकल्प की तरफ धकेल देती है। आज़ादी के इतने सालों में शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई किस्म के प्रयोग हुए, कई पद्धतियां अपनाई गईं, लेकिन राजनेताओं ने शिक्षा और परीक्षा की खामियों पर कभी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा करना जरूरी नहीं समझा।
अब राहुल गांधी ने कोटा से इसकी शुरुआत की है। उनके भाषण में इसी बात पर ज़ोर दिया गया कि हम बच्चों में रिजेक्शन यानी खारिज होने का डर भर देते हैं, जो ग़लत है। इधर कॉकरोच जनता पार्टी ने भी अब शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए जंतर-मंतर पर फिर धरना शुरु किया है। इस बार पुलिस की तय की गई समयसीमा को मानने से प्रदर्शनकारियों ने इंकार कर दिया और शनिवार से लेकर सोमवार को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक धरना जारी ही है। धरनास्थल पर खाने-पीने की व्यवस्था करने के लिए मोहम्मद जुनैद नाम के एक शख्स लगातार कर रहे हैं, सोमवार को उनके पैर छूकर अभिजित दिपके ने उन्हें शुक्रिया कहा।
इस मौके पर इंकलाब जिंदाबाद और ब्राह्मण वाद हो बर्बाद जैसे नारे भी सुनें गए । गौरतलब है कि शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए शुरु किया गया आंदोलन सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ भी रहा है। वहीं दिपके ने इस आंदोलन से किसानों को भी जुड़ने की अपील की थी। अब भारतीय किसान यूनियन के चढ़ूनी समूह ने ऐलान किया है कि युवाओं के भविष्य और उन्हें इंसाफ़ दिलाने के लिए भाकियू कॉकरोच जनता पार्टी का समर्थन करेगा। सरकार की गैर जिम्मेदाराना  रणनीति के विपरीत विपक्ष और आम जनता का बड़ा वर्ग शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए साथ आए तो इसे एक सकारात्मक बदलाव की तरह देखा जाए और सुधार हो सके।
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी 

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