कुम्भवाणी : जानिए क्यों है महाकुम्भ सनातन, संस्कृति और अध्यात्म का अमृत 

महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का जीवंत स्वरूप है, जो लोग अपनी आत्मा को पुनः जागृत करने और ईश्वर के निकटता का अहसास प्राप्त करना चाहे कुम्भ उन्हें यह  अवसर प्रदान करता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि जो संगम के  इन पवित्र नदियों के जल में डुबकी लगाते हैं, वे अनंत काल तक धन्य हो जाते हैं। यही नहीं, वे पाप मुक्त भी हो जाते हैं, उन्हें मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाता है। इस साल महाकुंभ( 2025) का महत्व अंक ज्योतिष के अनुसार और भी बढ़ जाता है क्योंकि इस साल और 144 वर्षों बाद बनने वाले दुर्लभ संयोग  प्रयागराज में महाकुंभ 2025 का यह आयोजन सभी श्रद्धालुओं के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बनने जा रहा है, जहां करोड़ों लोग आस्था, एकता और श्रद्धा के इस अद्वितीय पर्व में भाग लेकर आत्मिक शांति का अनुभव करेंगे। भारत में यह मेला बहुत अनूठा है, जिसमें पूरी दुनिया से लोग आते हैं और पवित्र नदी में स्नान करते हैं।। इसका अपना ही धार्मिक महत्व है और यह सनातन संस्कृति का भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। यह मेला लगभग 48 दिनों तक चलता है। मुख्य रूप से दुनिया भर से साधू, महात्मा, संत, योगी, संन्यासी, यति, तपस्वी, तंत्रिक, मान्त्रिक, याज्ञिक, तीर्थयात्री, कल्पवासी के साथ साथ समस्त श्रद्धालु भक्त इसमें भाग लेते हैं। हालांकि अंग्रेजो, ईसाइयों, मुसलमानों ने हिंदुओं के बारे में बहुत से माध्यमों से यह झूठ फैलाया गया  कि भारत में जातीय संघर्ष था और अस्पृश्यता छुआ-छूत है जिसे गलत साबित  करने का यह अनूठा उदाहरण है । महाकुम्भ  इस बात का प्रमाण है कि हिंदुओं से अधिक सदाशयता समानता सहृदयता और आपसी सामंजस्य किसी भी सेमेटिक मजहब, रिलीजन यहां तक कि कम्युनिस्ट संगठनों में भी है। देशभर में अखाड़ों की कुल संख्या 13 है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि  पूर्ण महाकुंभ मेला केवल प्रयागराज में आयोजित किया जाता है। यह प्रत्येक 144 वर्षों में या 12 महाकुंभ मेले के बाद आता है। महाकुंभ मेला जो हर 12 साल में आता है। मुख्य रूप से भारत में 4 कुंभ मेला स्थान यानि प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में आयोजित किए जाते हैं. यह हर 12 साल में इन 4 स्थानों पर बारी-बारी से आता है। अर्धकुंभ मेला जिसका अर्थ है आधा कुंभ मेला जो भारत में हर 6 साल में केवल दो स्थानों पर होता है, यानी हरिद्वार और प्रयागराज। कुंभ मेला: चार अलग-अलग स्थानों पर राज्य सरकारों द्वारा  आयोजित किया जाता है। लाखों/करोड़ो लोग आध्यात्मिक उत्साह के साथ भाग लेते हैं। महाकुम्भ में सभी 13 अखाड़े जो उदासीन, शैव और वैष्णव पंथ के संन्यासियों के हैं। 7 अखाड़ों का संबंध शैव संन्यासी संप्रदाय से हैं और 3 अखाड़े बैरागी वैष्णव संप्रदाय के हैं। इसके अलावा उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े हैं। दुनियां भर से सनातन जीवन पद्धति में आने वाले लगभग सारे मठ, समय नए पुराने आध्यात्मिक-धार्मिक-सामाजिक संगठन, ट्रस्ट, तमाम तरह के सेवा संगठन, सभी सरकारी गैर सरकारी व्यवस्थाएं, तमाम मंत्रालय, देश विदेश के लगभग सभी राज्यों के अपने टेंट, छावनियां वहां बनाई जाती हैं। यह विविधता देखने लायक होती है। इसी उद्देश्य से हजारों साल पहले हमारे तत्कालीन मनीषियों ने लोगों को इकट्ठा किया था कि एक जगह इकट्ठा होकर वे अध्यात्म पर वर्कशॉप, सेमिनार, मीटिंग्स, कक्षाएं, कोर्सेज आदि किया करेंगे।
अध्यात्म विषयों पर वहां इकट्ठा हुए तमाम विशेषज्ञों से प्रशिक्षण ले सकें। वहां समस्त सनातनी (हिंदू) पंथ संप्रदायों शैव, वैष्णव, पांचरात्र, वैखानस, साक्त, पाशिपत्य, लिंगायत कापालिक, मांगलिक, गानपत्य, समस्त मतों की लीडरशिप अपने मठ सहित अवश्य ही आती हैं। साथ ही सिख, बौद्ध और जैन पंथों के भी सभी मत कुंभ में आते हैं। सभी को  वार्ता, विमर्श, शास्त्रार्थ, ट्रेनिंग, ज्ञान सीखने के अनन्त अवसर सहज ही वहां मिल जाते है। कुंभ एक साथ स्नान, ध्यान, अभिषेक, पूजन, अर्चन, प्रार्थना, साधना,जप, तप, हवन, योग, दान आदि तमाम अभ्यास करने से सामाजिक द्वेष भी कम करने का तरीका रहा है। ऐसा कहा जाता है कि महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता दुर्बल पड़ गए, तब राक्षसों ने देवताओं पर आक्रमण करके उन्हें परास्त कर दिया था। ऐसे में सब पराजित देवता मिलकर विष्णु भगवान के पास गए और सारा व्रतांत सुनाया। तब भगवान ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र यानी क्षीर सागर में मंथन करके अमृत निकालने को कहा।
ये दूधसागर ब्रह्मांड के आकाशीय क्षेत्र में स्थित है। सारे देवता भगवान विष्णु जी के कहने पर दैत्यों से संधि करके अमृत निकालने के प्रयास में लग गए। जैसे ही समुद्र मंथन से अमृत निकला देवताओं के इशारे पर इंद्र का पुत्र जयंत अमृत कलश लेकर उड़ गया। इस पर गुरु शुक्राचार्य के कहने पर दैत्यों ने जयंत का पीछा किया और काफी परिश्रम करने के बाद दैत्यों ने जयंत को पकड़ लिया। अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव और राक्षसों में 12 दिन तक भयानक युद्ध चलता रहा। कहा जाता है कि इस युद्ध के दौरान प्रथ्वी के चार स्थानों पर अमृत कलश की कुछ बूंदे गिरी थीं, जिनमें से पहली बूंद प्रयाग में, दूसरी हरिद्वार में, तीसरी बूंद उज्जैन और चौथी नासिक में गिरी थी। इसीलिए इन्हीं चार जगहों पर कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। यहीं आपको बता दें की देवताओं के 12 दिन, पृथ्वी पर 12 साल के बराबर होते हैं, इसलिए हर 12 साल में महाकुम्भ का आयोजन किया जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार भगवान द्वारा  गरुड़ को अमृत के घड़े की सुरक्षा का काम सौंप दिया। गरुड़ जब अमृत को लेकर उड़ रहे थे, तब अमृत की कुछ बूंदें चार स्थानों – प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिर गईं।
तभी से हर 12 वर्ष बाद इन स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। वैसे इस कथा को जब आप डिकोड कर लेंगे तो कुंभ और अमृतकुंभ दोनों शब्दों के अर्थ बदल जाएंगे। सारे नवग्रहों में से सूर्य, चंद्र, गुरु और शनि की भूमिका कुंभ में महत्वपूर्ण मानी जाती है। जब अमृत कलश को लेकर देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध चल रहा था तब कलश की खींचा तानी में चंद्रमा ने अमृत को बहने से बचाया, गुरु ने कलश को छुपाया था, सूर्य देव ने कलश को फूटने से बचाया और शनि ने इंद्र के कोप से रक्षा की। इसीलिए ही तो जब इन ग्रहों का योग संयोग किसी विशेष राशि में होता है तब कुंभ मेले का आयोजन होता है। कुंभ गंगा यमुना सरस्वती का संगम पर लगता है, तीर्थों के तटों पर लगता है, प्रयाग तो वैसे महातीर्थ तीर्थराज है। कुंभ में बहुत सारे संन्यासी इकट्ठे होते हैं। तंत्रयोग का एक सर्वमान्य सिद्धान्त है। जिस जगह सारे संत, ज्ञानी, अद्वैत स्वरूपी चेतना, योगी, महात्मा, संन्यासी अपनी अपनी आध्यात्मिक विधाओं के श्रेष्ठतम लोग इकट्ठे होकर अपनी अपनी पद्धति से साधना करते हैं, तो परमात्मा उस स्थान पर ऊर्जा का स्रोत खुद ही खोल देता है। जन सामान्य के लिए यह बहुत बड़ा अवसर होता है अध्यात्म लाभ के लिए। वैसे भी सामान्यजन उनसे अपनी जिज्ञासाओं का समाधान कर लेते हैं। कुंभ में परम्परा है, बहुत सारे कल्पवासी एक-एक अलग अलग संत का पैर छूकर(साष्टांग) उनसे आशीर्वाद लेते हैं।
पंकज सीबी मिश्रा /राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

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