भारत की विशेषता यह है कि यहां लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि जनजीवन का हिस्सा है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद भारत ने विविधता को अपनी शक्ति बनाया है। यहां सैकड़ों भाषाएं, अनेक धर्म, संस्कृतियां और परंपराएं एक साथ जीवित हैं। यदि भारत वास्तव में इश्लाम विरोधी राष्ट्र होता, तो इतनी विविधता के बीच लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी मजबूती से कायम नहीं रह पाती। सपा और कांग्रेस के एक खास धर्म प्रेम से यूपी में भी बंगाल वाला समीकरण बन रहा। पहले शुभेन्दु अधिकारी नें बंगाल के सड़को पर नो नमाज का नियम लगाया तो योगी आदित्यनाथ नें भी यूपी में खुले सड़क पर नमाज करने पर नकेल कस दी। यह अखिलेश यादव से बर्दास्त नहीं हुआ और उन्होंने सड़क पर नमाज को खुला समर्थन देने जैसी बात कही है।
पर यूपी में भी अब नहीं चलेंगे एमवाय जैसे पुराने राजनीतिक टोटके। उत्तर प्रदेश की राजनीति तेजी से बदल रही है। कभी जातीय समीकरणों और सोशल इंजीनियरिंग के सहारे चुनाव जीतने वाली पार्टियों के सामने अब पहचान, राष्ट्रवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण की नई राजनीति खड़ी है। ऐसे माहौल में यदि समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण की छवि को मजबूत करते दिखाई देते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं यूपी भी पश्चिम बंगाल की तरह तीखे हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राह पर न बढ़ जाए। वरना अगला चुनाव एकतरफा हो जायेगा। पिछले कुछ वर्षों में बंगाल की राजनीति ने पूरे देश को यह संदेश दिया कि जब चुनावी विमर्श अत्यधिक धार्मिक पहचान पर केंद्रित हो जाता है, तब उसके जवाब में बहुसंख्यक समाज भी तेजी से संगठित होने लगता है।
ममता बनर्जी की राजनीति पर लंबे समय तक “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” के आरोप लगते रहे और उसी के समानांतर भाजपा ने हिंदू वोटों के बड़े ध्रुवीकरण का आधार तैयार किया। अपनी अकड़ और कल्याण बनर्जी, सयानी घोष, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा की राजनीतिक बेवकूफियों को ममता अपनी उपलब्धि समझने लगी। आज वही आशंका उत्तर प्रदेश को लेकर जताई जाने लगी है। अखिलेश यादव ईर्ष्या की आग में लगातार झुलसे जा रहे हैं। यही कारण है कि अब “ब्राह्मण कार्ड” जैसी रणनीतियां पहले जैसी प्रभावी नहीं दिख रहीं। एक समय था जब चुनाव आते ही हर किसी दल को ब्राह्मण सम्मेलन याद आता था। किसी को ठाकुर समीकरण और किसी को दलित-मुस्लिम गठजोड़। लेकिन आज का मतदाता पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक रूप से सजग और वैचारिक हो चुका है।
वह पूछता है कि केवल जाति के नाम पर वोट क्यों दिया जाए ? जातियां टुकड़ों में नहीं बंट रही विराट हिन्दुत्व से जुड़ चुकी हैं। विकास, सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और मजबूत नेतृत्व जैसे मुद्दे भी अब निर्णायक बन चुके हैं। यदि अखिलेश की राजनीति केवल मुस्लिम वोटों के इर्द-गिर्द घूमती दिखेगी, तो भाजपा के लिए हिंदू ध्रुवीकरण और आसान हो सकता है। यही बंगाल में हुआ था, जहां भाजपा ने खुद को “हिंदू अस्मिता” के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में स्थापित कर लिया। उत्तर प्रदेश में भी विपक्ष के हर बयान और हर राजनीतिक संकेत को इसी नजरिए से देखा जाने लगा है।
2027 की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में लड़ाई केवल जातीय अंकगणित की नहीं रहने वाली। यह वैचारिक संघर्ष भी होगा और इस संघर्ष में वही दल टिकेगा जो व्यापक सामाजिक विश्वास पैदा करेगा, केवल चुनावी समीकरण नहीं। जातीय और मुस्लिम कार्ड फेल हो गए हैं। अब राजनीति भावनात्मक पहचान, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। समाजवादी पार्टी की परंपरागत राजनीति एमवाय यानी मुस्लिम-यादव समीकरण पर आधारित रही है। लेकिन 2020 के बाद की राजनीति में हिंदू समाज के भीतर जातीय पहचान से अधिक सांस्कृतिक और धार्मिक एकता का भाव उभरता दिखाई दे रहा है। अयोध्या में मंदिर निर्माण, काशी और मथुरा जैसे मुद्दों और अब सम्भल और भोजवासा ने भाजपा को एक व्यापक वैचारिक आधार दिया है। ऐसे में यदि विपक्ष केवल मुस्लिम वोट बैंक को साधने वाली भाषा बोलता दिखे, तो उसका उल्टा असर होना तय है।
पश्चिमी देशों द्वारा समय-समय पर भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर उठाए जाने वाले सवाल कोई नई बात नहीं हैं। कभी धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर, कभी अभिव्यक्ति की आज़ादी के बहाने, तो कभी अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा उठाकर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाती है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में भारत मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला राष्ट्र है, या फिर यह वैश्विक राजनीति और वैचारिक संघर्ष का हिस्सा है? दरअसल, भारत के खिलाफ मानवाधिकारों का नैरेटिव कई बार भू-राजनीतिक हितों से प्रेरित दिखाई देता है। जैसे-जैसे भारत आर्थिक और सामरिक रूप से मजबूत हुआ है, वैसे-वैसे उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव में रखने के प्रयास भी बढ़े हैं।
पश्चिमी थिंक टैंक, कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान और तथाकथित मानवाधिकार संगठन अक्सर भारत की चुनिंदा घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं, जबकि सकारात्मक पक्षों को नजरअंदाज कर देते हैं। नार्वे में एक पत्रकार ने सवाल क्या पूछा, भारत में विपक्ष का रो रोकर बुरा हाल हो गया है ! भारत में रहने के बावजूद वे घोर निराशावादी नकारात्मक लोग शायद भारत का इतिहास जानते ही नहीं। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी सभ्यतागत शक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखे। नार्वे की उस कथित आधुनिकतावादी पत्रकार को हम बताना चाहते हैं कि भारत से बड़ा मनुष्यतावादी देश कोई दूसरा नहीं।
केवल पश्चिमी प्रमाणपत्रों के आधार पर अपने राष्ट्र का मूल्यांकन करना उचित नहीं। मानवाधिकारों की रक्षा केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं होती, बल्कि समाज में सहिष्णुता, न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने से होती है। इस दिशा में भारत का ऐतिहासिक योगदान विश्व में अद्वितीय रहा है। सच यह है कि यदि विश्व इतिहास को निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो मानवाधिकारों की अवधारणा का सबसे प्राचीन और व्यापक दर्शन भारत की भूमि पर ही विकसित हुआ। “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “अहिंसा परमो धर्मः” जैसे सिद्धांत केवल आध्यात्मिक वाक्य नहीं, बल्कि मानव गरिमा और समानता के शाश्वत घोष हैं।
जब यूरोप साम्राज्यवाद, दास व्यापार और धार्मिक नरसंहारों में उलझा था, तब भारत विश्व को सह-अस्तित्व और सहिष्णुता का मार्ग दिखा रहा था। यह भी विडंबना है कि जो पश्चिमी देश आज भारत को मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाते हैं, उनका अपना इतिहास उपनिवेशवाद और रक्तपात से भरा पड़ा है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के करोड़ों लोगों का शोषण करने वाले यही राष्ट्र आज नैतिकता के सबसे बड़े प्रहरी बनने का दावा करते हैं। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप के नाम पर लाखों लोगों की मौत हुई, लेकिन उन घटनाओं पर वही पश्चिम अक्सर मौन दिखाई देता है।

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
